
इमरजेंसी के दिनों में अटल बिहारी वाजपेयी नजरबंद थे। उन्हें दिल्ली के 1, फिरोज़शाह रोड बंगले में नजरबंद रखा गया था। एम्स में उनकी स्लिप डिस्क की सर्जरी होनी थी, इसलिए उन्हें बंगलोर की जेल से दिल्ली लाकर रखा गया था। विपक्ष इस कोशिश में था कि इंदिरा गांधी किसी तरह चुनाव करवा दें। दिसंबर, 1976 में ओम मेहता (जो इंदिरा के करीबी थे और सरकार की ओर से संपर्क सूत्र का काम भी कर रहे थे) उनसे मिले और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) की शिकायत की।
मेहता ने बताया कि एबीवीपी के लड़कों ने हिंसा की है और रेल की पटरियां उखाड़ दी हैं। उस समय राम बहादुर राय एबीवीपी के राष्ट्रीय सचिव हुआ करते थे। वह खुद मध्य प्रदेश में जेल में बंद थे। जब उनकी रिहाई हुई तो वह तुरंत वाजपेयी से मिलने दिल्ली पहुंचे। वाजपेयी ने उन्हें समझाया कि एबीवीपी की ओर से माफी मांग ली जाए।
नीरजा चौधरी अपनी किताब 'हाउ प्राइम मिनिस्टर्स डिसाइड' में लिखती हैं कि वाजपेयी ने राय से कहा, 'चुनाव कराने के लिए अगर खेद प्रकट करने से मदद मिलती है तो एबीवीपी को तैयार रहना चाहिए।' राय ने एबीवीपी के हिंसा में शामिल होने से इंकार कर दिया और कहा, 'खेद प्रकट करने का सवाल ही नहीं उठता। खेद जताने की जगह हम हिंसा करना पसंद करेंगे।'
1989 के लोक सभा चुनाव में पूरे अभियान के दौरान देवीलाल ने वीपी सिंह को बतौर प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट किया, लेकिन नतीजे आते ही उनका मन बदल गया। वह खुद पीएम बनना चाहने लगे। चंद्रशेखर ने भी उन्हें पीएम के लिए दावेदारी रखने की सलाह दी। इसके बाद देवीलाल सबसे कहने लगे कि मेरे बिना जनता दल है ही क्या! उन्होंने बीजेपी के नेताओं को भी समर्थन के लिए संदेशा भिजवाया। बीजेपी हरियाणा में उनकी सरकार को पहले से समर्थन दे रही थी, ऐसे में उन्हें बीजेपी से कुछ ज्यादा ही उम्मीद थी।
देवीलाल ने चंद्रास्वामी और उनके सहयोगी कैलाश नाथ अग्रवाल उर्फ मामाजी को अटल बिहारी वाजपेयी से मिलने के लिए कहा। मामाजी ने प्रस्ताव रखा कि देवीलाल को प्रधानमंत्री बनवाने में बीजेपी समर्थन करे और बदले में हिन्दू राष्ट्र के लिए उनका समर्थन ले। लेकिन, वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी ने प्रस्ताव को हवा में उड़ा दिया। उन्होंने जनमत का हवाला देकर वीपी सिंह को ही समर्थन देने का फैसला किया।
वाजपेयी जहां आत्मविश्वास से भरे नेता थे, वहीं बड़े विनोदी स्वभाव के भी थे। मोरारजी सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री हुआ करते थे। 1977 में 9-11 दिसंबर के बीच दोनों नेपाल यात्रा पर गए थे। दोनों को महल की अतिथिशाला में ठहराया गया था। वहां एएस दुलत की भी ड्यूटी लगी थी और इस नाते उनका उनके गेस्ट हाउस में आना-जाना होता था।
दुलत ने अपनी किताब 'कश्मीर: द वाजपेयी ईयर्स' में वहां के एक वाकये का जिक्र किया है। पीएम और विदेश मंत्री जब ग्राउंड फ्लोर पर आने के लिए अपने-अपने कमरों से निकलते थे तो देसाई हमेशा अपने तय समय से दो मिनट पहले लिफ्ट के पास आ जाते थे, जबकि वाजपेयी हर बार तय समय से दो मिनट देर हो जाते थे। एक बार मोरारजी भाई ने अटल जी से शिकायती लहजे में कह ही डाला, 'अटल जी, आप हमेशा आने में देर कर देते हैं।' अटल जी ने फौरन जवाब दिया, 'प्रधानमंत्री जी, आप समय से पहले आते हैं।' उनके इस जवाब पर दोनों ठहाके लगाने लगे।
अटल बिहारी वाजपेयी आज भी एक ऐसे नेता के रूप में जाने जाते हैं, जो विपक्ष का सम्मान करते हुए उसका साथ लेकर आगे बढ़ना चाहते थे। श्रीलंका के प्रधानमंत्री रहे रानिल विक्रमसिंघे ने एक बार ऐसे ही एक वाकये का जिक्र किया था। उन्होंने अटल स्मृति व्याख्यानमाला में बताया था कि जब वह श्रीलंका के प्रधानमंत्री बने थे तो तुरंत दिल्ली आकर पीएम वाजपेयी से मिले और श्रीलंका के हालात पर चर्चा की। उन दिनों श्रीलंका में लिट्टे का आतंक था और वहां की सरकार बातचीत के जरिए समाधान में जुटी थी। नॉर्वे और जापान की मध्यस्थता में लिट्टे से बातचीत चल रही थी। विक्रमसिंघे ने बताया कि वह वाजपेयी से पहले भी इस मुद्दे पर बातचीत करते रहे थे और उन्होंने शुरू में ही कह दिया था कि वह हमारे साथ हैं, लेकिन एक बार सारी बात सोनिया गांधी को भी समझा दें।
वाजपेयी खाने-पीने के भी शौकीन थे। विक्रमसिंघे जब भी उनसे मिलने आते, दो बड़े बॉक्स में श्रीलंका का हाथ से बना बेहतरीन चॉकलेट लेकर आते। हालांकि, वाजपेयी को मीठा खाना मना था।