
बीजेपी (BJP) में संगठनात्मक बदलाव का एक बड़ा दौर पूरा होने के बाद अब निगाहें पार्टी की सबसे महत्वपूर्ण निर्णायक संस्थाओं में शामिल संसदीय बोर्ड और केंद्रीय चुनाव समिति पर टिक गई हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की नई टीम और राज्यों के प्रभारियों की नियुक्ति के बाद अब इन दोनों अहम निकायों के पुनर्गठन को लेकर पार्टी के भीतर चर्चाएं तेज हैं। इसके साथ ही राष्ट्रीय कार्यकारिणी का भी नए सिरे से गठन किया जाना है। माना जा रहा है कि नई राष्ट्रीय टीम में जिस तरह संगठन और सामाजिक-क्षेत्रीय संतुलन पर जोर दिखाई दिया है, उसके बाद संसदीय बोर्ड में भी इसी तरह के समीकरणों को साधा जाएगा।
अगले वर्ष पंजाब, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर और गोवा समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। इसलिए केंद्रीय चुनाव समिति के नए स्वरूप को आगामी चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण संकेत माना जाएगा।
संसदीय बोर्ड में बदलाव इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि पार्टी के संगठनात्मक और राजनीतिक फैसलों में इसकी केंद्रीय भूमिका है। प्रमुख पदों पर नियुक्तियों और गठबंधन से जुड़े फैसले, महत्वपूर्ण नीतिगत निर्णय और अनुशासनात्मक कार्रवाई जैसे मामलों में भी बोर्ड की भूमिका रहती है। वहीं संसदीय बोर्ड के सभी सदस्य केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य होते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi), राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा, केंद्रीय मंत्री सर्वानंद सोनोवाल, ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. के. लक्ष्मण, डॉ. इकबाल सिंह लालपुरा, डॉ. सुधा यादव और डॉ. सत्यनारायण जटिया संसदीय बोर्ड के सदस्य हैं।
चुनाव समिति में संसदीय बोर्ड के साथ ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव के साथ ही वनथी श्रीनिवासिनी भी सदस्य हैं। माना जा रहा है कि उनके साथ ही एक और राज्य के मुख्यमंत्री को चुनाव समिति में जगह मिल सकती है। इसके लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के साथ ही कुछ केंद्रीय मंत्रियों के नामों पर भी विचार किया जा रहा है। वहीं केंद्रीय कार्यकारिणी से वंचित रहे कुछ प्रमुख चेहरे संसदीय बोर्ड में शामिल किए जा सकते हैं।