
भूखंड (Photo - ANI)
भारत के हर शहर में अब में ज़मीन का भी आधुनिक तकनीक से डिजिटल रिकॉर्ड (Digital Record) बनाने की तैयारी तेज हो गई है। शहरी क्षेत्रों में हवाई सर्वे, ड्रोन और भू-स्थानिक तकनीक के जरिए भूखंडों का डिजिटल नक्शा तैयार किया जा रहा है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि ज़्यादातर रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण, पुराने नक्शों को डिजिटल करने और उन्हें राजस्व रिकॉर्ड से जोडऩे का काम जारी है।
ग्रामीण विकास और पंचायती राज संबंधी स्थायी समिति की रिपोर्ट की मानसून सत्र के दौरान संसद में पेश की गई है। इसमें बताया गया है कि शहरी भूमि रिकॉर्ड को आधुनिक बनाने के लिए नेशनल जियोस्पेशियल नॉलेज-बेस्ड लैंड सर्वे ऑफ अर्बन हैबिटेशंस (नक्शा) परियोजना पर काम चल रहा है। इसके तहत हवाई सर्वे और अन्य भू-स्थानिक तकनीकों से शहरी भूखंडों की सीमाओं, आकार और स्थिति का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है। फिलहाल यह पायलट परियोजना 157 शहरी स्थानीय निकायों में चल रही है। इसका उद्देश्य शहरी भूमि रिकॉर्ड को जीआईएस आधारित डिजिटल व्यवस्था में लाना है।
पायलट परियोजना के परिणामों के आधार पर नक्शा को आगे करीब 1,000 शहरी स्थानीय निकायों तक ले जाने और इसके बाद देश के सभी 4,912 शहरी स्थानीय निकायों में लागू करने की तैयारी है। इससे भूखंड की पहचान, उसकी सीमा और संबंधित भूमि रिकॉर्ड को एक साझा डिजिटल व्यवस्था से जोडऩे में मदद मिलेगी।
समिति ने डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित भूमि अधिकार रिकॉर्ड को कागज की प्रमाणित प्रति के बराबर कानूनी मान्यता देने की सिफारिश की है। इससे ज़मीन के रिकॉर्ड के इस्तेमाल में आसानी होगी और कागजी प्रमाणित प्रतियों पर निर्भरता कम हो सकती है। समिति ने यह भी कहा है कि केवल पुराने रिकॉर्ड को डिजिटल करना पर्याप्त नहीं है। डिजिटल रिकॉर्ड को संबंधित जमीन के नक्शे से जोडऩा और ज़मीन की वास्तविक स्थिति में हुए बदलावों को भी रिकॉर्ड में दर्ज करना ज़रूरी है।
भूमि पंजीकरण और राजस्व रिकॉर्ड को जोडऩे के लिए रजिस्ट्री के बाद नामांतरण की प्रक्रिया शुरू करने की व्यवस्था की जा रही है। यह व्यवस्था 17 राज्यों में लागू हो चुकी है। हालांकि नोटिस, आपत्ति, सत्यापन और सुनवाई जैसी कानूनी प्रक्रियाएं इससे खत्म नहीं होंगी। 31 जनवरी तक पंजीकरण कार्यालयों का 95.73% कंप्यूटरीकरण हो चुका था, जबकि पंजीकरण और राजस्व कार्यालयों के बीच एकीकरण 88.56% तक पहुंच गया था।
कई जगह पुराने नक्शे ज़मीन की मौजूदा स्थिति से मेल नहीं खाते। ज़मीन के बंटवारे, एकीकरण या अधिग्रहण के बाद स्थिति बदल चुकी है। ऐसे मामलों में सिर्फ पुराने नक्शे को डिजिटल करना पर्याप्त नहीं होगा। मौके पर जमीन की सीमा की पुष्टि और ज़रूरत के अनुसार नए सर्वे की आवश्यकता होगी। डिजिटल व्यवस्था के साथ पुराने कागजी रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना भी चुनौती है। 31 जनवरी तक स्वीकृत तहसीलों में आधुनिक रिकॉर्ड कक्षों की स्थापना 72.50% ही हुई थी।
समिति ने भूमि रिकॉर्ड की डिजिटल व्यवस्था में पूर्वोत्तर के लिए अलग दृष्टिकोण की जरूरत बताई गई है। कई क्षेत्रों में ज़मीन का स्वामित्व पारंपरिक और सामुदायिक व्यवस्था पर आधारित है। ऐसे में देश के अन्य हिस्सों में लागू व्यक्तिगत स्वामित्व वाले भूमि रिकॉर्ड की व्यवस्था वहाँ सीधे लागू नहीं की जा सकती। समिति ने स्थानीय कानूनों और पारंपरिक संस्थाओं के अनुरूप डिजिटल भूमि रिकॉर्ड व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया है।
ग्रामीण भूमि रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण के तहत अब तक 37 करोड़ से ज़्यादा भूखंडों को 14 अंकों की विशिष्ट भूमि पहचान संख्या दी जा चुकी है। यह व्यवस्था 29 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लागू हो चुकी है। इस पहचान संख्या को आगे रजिस्ट्री, नामांतरण, कृषि ऋण, फसल बीमा, सरकारी खरीद, भूमि अधिग्रहण और कर जैसी सेवाओं से जोडऩे की योजना है। पुराने भूमि नक्शों के डिजिटलीकरण का काम 97.42% तक पहुंच चुका है, जबकि डिजिटल भूमि रिकॉर्ड और नक्शों के एकीकरण का काम 84.32% गांवों में पूरा हुआ है।
Updated on:
20 Aug 2026 01:37 am
Published on:
20 Aug 2026 01:37 am
