BRICS India Presidency 2026: ब्रिक्स में ईरान, सऊदी अरब और UAE के बीच बढ़ते मतभेद के चलते भारत के लिए सहमति बनाना मुश्किल हो गया है। जानें कैसे मिडिल ईस्ट तनाव ने मोदी सरकार की कूटनीतिक चुनौती बढ़ा दी है।
BRICS India Presidency 2026: इस साल भारत BRICS की अध्यक्षता कर रहा है, जो एक ओर उसके लिए वैश्विक मंच पर नेतृत्व का अवसर है, वहीं दूसरी ओर यह जिम्मेदारी नई कूटनीतिक चुनौतियां भी लेकर आई है। मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने BRICS जैसे बहुपक्षीय मंच पर सहमति बनाना और कठिन बना दिया है।
BRICS समूह के भीतर इस समय मतभेद साफ नजर आ रहे हैं। एक तरफ पूर्णकालिक सदस्य के रूप में ईरान है, वहीं दूसरी ओर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देश हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान चाहता है कि BRICS अमेरिका और इजरायल के हमलों की निंदा करे। इसके लिए वह अध्यक्ष देश भारत से लगातार अनुरोध कर रहा है।
वहीं, सऊदी अरब और UAE का रुख इससे अलग है। ये देश चाहते हैं कि BRICS ईरान के खिलाफ सख्त प्रस्ताव लाए। ऐसे में दोनों पक्षों की विपरीत मांगों के कारण संगठन के भीतर सहमति बनाना मुश्किल हो गया है।
भारत इन दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है। फिलहाल भारत ने किसी भी पक्ष के समर्थन में सार्वजनिक बयान देने से परहेज किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह रणनीति उसके संतुलित कूटनीति के दृष्टिकोण को दर्शाती है, लेकिन इससे BRICS के भीतर जारी मतभेद और स्पष्ट हो गए हैं।
BRICS दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक प्रभावशाली समूह है। शुरुआत में इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल थे। हाल के विस्तार के बाद अब इसमें मिस्र, इथियोपिया, ईरान, UAE, सऊदी अरब और इंडोनेशिया जैसे देश भी शामिल हो चुके हैं।
यह समूह वैश्विक आबादी का करीब 40% और वैश्विक GDP का लगभग 37% प्रतिनिधित्व करता है। इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच व्यापार, निवेश और विकास को बढ़ावा देना है।
भारत ने 1 जनवरी 2026 से BRICS की अध्यक्षता संभाली है और BRICS 2026 के तहत कई पहल शुरू की हैं। भारत डिजिटल भुगतान प्रणाली UPI और आधार जैसे मॉडल अन्य सदस्य देशों के साथ साझा करने पर जोर दे रहा है।
इसके अलावा, भारत सुरक्षा सहयोग बढ़ाने और सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ सख्त वैश्विक कार्रवाई की भी वकालत कर रहा है।
BRICS का 18वां शिखर सम्मेलन भारत की मेजबानी में आयोजित होना है। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती एक साझा घोषणापत्र तैयार करना होगा, जिसमें मिडिल ईस्ट के मुद्दे पर सभी देशों की सहमति बन सके। मौजूदा हालात को देखते हुए यह काम आसान नहीं माना जा रहा है।