पाकिस्तान की कूटनीति और ट्रंप के फैसले से बड़ी तबाही टल गई। अमेरिका-ईरान युद्ध दो हफ्ते के लिए टल गया। राष्ट्रपति ने तय समय से 90 मिनट पहले हमले रोकने का ऐलान किया।
US Iran War: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कई दिनों से चरम पर था। अमेरिकी चेतावनियों और सैन्य तैयारियों ने हालात को बेहद गंभीर बना दिया था। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को एक डेडलाइन दी थी, लेकिन इससे ठीक 90 मिनट पहले ईरान पर बड़े हमले को दो सप्ताह के लिए रोकने की घोषणा कर दी। दोनों दोनों देशों के बीच 10 मांगों पर सहमति बनी। दरअसल, दोनों देशों के बीच सीजफायर में पाकिस्तान ने बिचौलिए की भूमिका निभाई थी।
आइए जानते है कि सीजफायर के ऐलान से पहले 24 घंटे में क्या-क्या हुआ था…
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सुबह सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट किया रात 8 बजे तक ईरान पर एक बड़े हमले की योजना बनाई गई है। इस हमले के संभावित लक्ष्यों में पुल, बिजली संयंत्र और जल से जुड़े बुनियादी ढांचे शामिल बताए गए।
ईरानी सरकार ने नागरिकों से इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा के लिए आगे आने की अपील की। इसके बाद हजारों लोगों ने बिजली संयंत्रों के बाहर घेराव कर विरोध जताया। यह कदम शिया परंपरा में बलिदान की भावना को दर्शाता है। इस दौरान इजराइल और अमेरिका के हमले जारी रहे, जिनमें रेलवे और तेल ठिकानों को निशाना बनाया गया। ईरान के अधिकारियों ने कहा कि वे किसी भी दबाव के आगे झुकने वाले नहीं हैं।
शहबाज शरीफ ने दो सप्ताह के सीजफायर का प्रस्ताव रखा और दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की। इस प्रस्ताव में ईरान से होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने की मांग भी रखी गई, जिससे अमेरिका को पीछे हटने का सम्मानजनक रास्ता मिला और ईरान को समझौते का अवसर मिला। व्हाइट हाउस ने संकेत दिए कि इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
ईरान की ओर से 10 बिंदुओं का प्रस्ताव पहले ही भेजा जा चुका था, जिसमें प्रतिबंध हटाने और संपत्तियों की बहाली जैसी मांगें शामिल थीं। हालांकि इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने की शर्त सबसे महत्वपूर्ण थी। आखिरकार, ट्रंप ने 6:32 बजे शाम को हमले को स्थगित करने की घोषणा कर दी। यह फैसला युद्ध को टालने में निर्णायक साबित हुआ।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यदि हमले रोके जाते हैं तो ईरान भी सैन्य कार्रवाई बंद करेगा। इस घोषणा का वैश्विक बाजार पर तुरंत असर पड़ा, जिसके बाद कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई और शेयर बाजार में तेजी देखी गई। दोनों देशों ने इस समझौते को अपनी-अपनी जीत बताया, लेकिन असल में यह कूटनीति की जीत थी।