आंतरिक सुरक्षा सुदृढ़ करने के लिए सीएपीएफ बिल ज़रूरी है। क्या है एक्सपर्ट्स की राय? आइए नज़र डालते हैं।
केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) में शीर्ष पदों पर भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अफसरों की तैनाती को लेकर सुरक्षा और प्रशासनिक हलकों में बहस छिड़ी है। इस संबंध में कानूनी प्रावधानों के लिए संसद में सीएपीफ बिल 2026 पर चर्चा चल रही है। विपक्ष और सीएपीएफ के आंतरिक कैडर के कुछ रिटायर्ड अधिकारी इसका विरोध कर रहे हैं और इसी वजह से इस पर विवाद छिड़ा हुआ है।
सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स का मानना है कि उच्च पदों पर आईपीएस अफसरों की तैनाती से सीएपीएफ के मज़बूत होने के साथ देश में आंतरिक सुरक्षा का ढांचा सुदृढ़ होगा। एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह मुद्दा केवल पदोन्नति या सेवा हितों का नहीं, बल्कि भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था की संरचनात्मक आवश्यकता से जुड़ा है। सरकारी सूत्रों का कहना है कि भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) का मूल उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच कानून-व्यवस्था, खुफिया और प्रशासनिक तालमेल सुनिश्चित करना है। सीएपीएफ का अपना कैडर इस भूमिका के लिए तुलनात्मक रूप से दक्ष नहीं माना जा सकता। एक्सपर्ट्स के अनुसार मज़बूत सीएपीएफ और आईपीएस नेतृत्व परस्पर विरोधी नहीं बल्कि पूरक हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित नेतृत्व मॉडल बनाए रखना ही दीर्घकालिक समाधान है।
सीएपीएफ अक्सर राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर काम करते हैं, इसलिए व्यापक प्रशासनिक और रणनीतिक अनुभव वाले नेतृत्व की ज़रूरत बनी रहती है। आइपीएस अफसरों का चयन और प्रशिक्षण उन्हें जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर सुरक्षा प्रबंधन के लिए तैयार करता है। इससे उग्रवाद, आतंकी गतिविधियों, चुनाव सुरक्षा और दंगा नियंत्रण जैसी आंतरिक सुरक्षा की जटिल परििस्थति में बहुस्तरीय तालमेल में उनकी भूमिका अहम हो जाती है।
इस बिल में सीएपीएफ ग्रुप-ए जनरल ड्यूटी अधिकारियों और अन्य अधिकारियों की भर्ती और सेवा शर्तों से संबंधित सामान्य नियमों को विनियमित किया गया है। इसके तहत आईजी रैंक के कुल पदों में से 50 %, एडीजी रैंक के पदों पर कम से कम 67% और विशेष महानिदेशक और महानिदेशक रैंक के सभी पद आइपीएस अफसरों की प्रतिनियुक्ति से भरे जा सकेंगे।