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एक और जंग शुरू होने का संकेत, अब चीन के खिलाफ खुला मोर्चा

Sinicization : चीन के नए दमनकारी कानून के खिलाफ तिब्बती सरकार ने प्रस्ताव पारित किया है, जो तिब्बती पहचान को मिटाने की चीनी साजिश का पर्दाफाश करता है।

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Mar 24, 2026
चीन तिब्बत विवाद। ( फोटो: ANI)

China Tibet Conflict 2026: तिब्बती निर्वासित संसद (Tibetan Parliament-in-Exile) ने चीन के नए (Ethnic Unity Law) के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है, जिससे (Geopolitical Tension) बढ़ गई है। तिब्बत सरकार ने इसे (Cultural Genocide) का जरिया बताते हुए एक कड़ा प्रस्ताव पारित किया है। इस कानून के जरिए चीन (Forced Assimilation) की नीति अपनाकर तिब्बती पहचान मिटाने की कोशिश कर रहा है। (Human Rights) के उल्लंघन और (Sino-Tibet Relations) में बढ़ती कड़वाहट ने एशिया में युद्ध के नए संकेत दिए हैं।

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तिब्बत की अस्मिता पर प्रहार (Tibetan Identity Crisis)

चीन की नेशनल पीपुल्स कांग्रेस ने 12 मार्च को 'जातीय एकता और प्रगति' (Law on Promoting Ethnic Unity and Progress) नामक कानून को मंजूरी दी है। धर्मशाला में स्थित तिब्बती निर्वासित संसद ने इस कानून की कड़ी निंदा करते हुए इसे सर्वसम्मति से खारिज कर दिया। तिब्बती नेताओं का मानना है कि यह कानून 1 जुलाई से लागू होने के बाद तिब्बत की विशिष्ट सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक विरासत को पूरी तरह खत्म कर देगा।

जबरन थोपी जा रही चीनी भाषा (Mandarin Language Imposition)

इस नए कानून के तहत स्कूलों में तिब्बती भाषा के बजाय मेंडारिन (Mandarin) को प्राथमिकता दी जा रही है। तिब्बती संसद के अनुसार, चीन अपनी 'दूसरी पीढ़ी की जातीय नीति' के माध्यम से 'झोंगहुआ मिन्ज़ू' (Shared National Identity) का विचार थोप रहा है। इसके जरिए बच्चों को उनकी जड़ों से काटकर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CCP) के रंग में रंगने की साजिश रची जा रही है।

डिजिटल निगरानी और दमन (Digital Surveillance in Tibet)

तिब्बती सांसदों ने चेतावनी दी है कि इस कानून के बहाने चीन ने तिब्बत में निगरानी तंत्र (Surveillance) को और मजबूत कर दिया है। न केवल तिब्बत के भीतर, बल्कि विदेशों में रह रहे तिब्बतियों को भी 'अलगाववाद' के नाम पर निशाना बनाने की योजना है। यह कानून चीन के अपने संविधान और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार नियमों का खुला उल्लंघन है। तिब्बती निर्वासित सरकार के राष्ट्रपति पेनपा त्सेरिंग ने कहा कि यह कानून 'एक राष्ट्र, एक भाषा' के खतरनाक सिद्धांत को कानूनी जामा पहनाने की कोशिश है, जिसे दुनिया को रोकना चाहिए।

चीन पर बढ़ सकता है आर्थिक और कूटनीतिक दबाव

अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब इस मामले को संयुक्त राष्ट्र (UN) में उठाने की तैयारी कर रहा है, जिससे चीन पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है। जानकारों का मानना है कि जहां एक ओर मध्य-पूर्व में ईरान-इजराइल तनाव बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर चीन का तिब्बत और ताइवान पर बढ़ता आक्रामक रुख तीसरे विश्व युद्ध की आहट दे रहा है। ( इनपुट : ANI)


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