
Delhi High Court: दिल्ली हाईकोर्ट ने जिमखाना क्लब परिसर को केंद्र सरकार द्वारा वापस लेने से जुड़े विवाद में समानांतर सुनवाई की संभावना पर चिंता जताई है। वहीं केंद्र सरकार ने नई रिट याचिका की सुनवाई योग्य होने पर प्रारंभिक आपत्ति जताई है। केंद्र सरकार ने कहा कि इसी विवाद से जुड़े सिविल मुकदमे पहले से हाईकोर्ट में लंबित हैं।
जस्टिस अमित महाजन की पीठ ने विपिन अग्रवाल और अन्य की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की। याचिका में केंद्र सरकार की 22 मई 2026 की रेजम्पशन अधिसूचना और इसके बाद सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के तहत एस्टेट ऑफिसर की ओर से जारी नोटिस को चुनौती दी गई है।
केंद्र सरकार की ओर से पेश सेंट्रल गवर्नमेंट स्टैंडिंग काउंसल आशीष के. दीक्षित ने प्रारंभिक आपत्ति दर्ज करते हुए कहा कि इसी रेजम्पशन अधिसूचना और उससे जुड़ी कार्यवाही को लेकर कई सिविल मुकदमे पहले से हाईकोर्ट में लंबित हैं।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की ओर से पहले दायर की गई संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत कार्यवाही का भी हवाला दिया। दीक्षित ने कहा कि कि सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को स्वतंत्र कार्यवाही के जरिए हाईकोर्ट जाने या लंबित मामलों में पक्षकार बनने की स्वतंत्रता दी थी, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि एक ही विवाद को लेकर हाईकोर्ट में समानांतर कार्यवाही शुरू कर दी जाए।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह और अधिवक्ता वेंकटेश सिंह कोर्ट में पेश हुए। उन्होंने केंद्र सरकार की आपत्ति का विरोध किया। उन्होंने कहा कि क्लब के व्यक्तिगत सदस्यों को अधिकारियों की ओर से की जा रही कथित जबरन कार्रवाई को स्वतंत्र रूप से चुनौती देने का अधिकार है।
विकास सिंह ने यह भी दलील दी कि लंबित सिविल मुकदमों की सुनवाई योग्य होने पर खुद प्रतिवादियों ने पहले सवाल उठाए हैं। ऐसे में अब वे यह नहीं कह सकते कि मौजूदा रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है।
याचिकाकर्ताओं ने 22 मई की रेजम्पशन अधिसूचना को रद्द करने की मांग की है। उनका दावा है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 300A में दिए गए अधिकारों के साथ-साथ सरकारी अनुदान अधिनियम, 1895 और स्थायी लीज डीड की शर्तों का उल्लंघन करती है।
इसके अलावा 29 जून को एस्टेट ऑफिसर की ओर से सार्वजनिक परिसर अधिनियम के तहत जारी नोटिस को भी चुनौती दी गई है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जिमखाना क्लब का परिसर सार्वजनिक परिसर की परिभाषा के दायरे में नहीं आता और क्लब को अनधिकृत कब्जे में नहीं माना जा सकता।
सुनवाई के दौरान जस्टिस अमित महाजन ने सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेश पर भी विचार किया। सुप्रीम कोर्ट ने लंबित सिविल मुकदमों और संबंधित कार्यवाहियों का संज्ञान लेते हुए याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट के समक्ष उचित उपाय अपनाने और/या लंबित मामलों में पक्षकार बनने की स्वतंत्रता दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि उसने विवाद के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने एक जैसे मुद्दों से जुड़े सिविल मुकदमों के लंबित होने को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट में उचित उपाय अपनाने की अनुमति दी थी।
हालांकि, जस्टिस महाजन ने टिप्पणी की कि मौजूदा परिस्थितियों में स्वतंत्र उपाय का अर्थ सिविल मुकदमा दायर करना होगा और ऐसे मुकदमे की सुनवाई उसी पीठ या संबंधित रोस्टर पीठ के समक्ष हो सकती है, जो पहले से लंबित सिविल मामलों की सुनवाई कर रही है। इससे एक ही विवाद को लेकर कई समानांतर कार्यवाहियों से बचा जा सकेगा।
कोर्ट ने कहा कि रिट याचिका को जारी रखना दो अलग-अलग अदालतों द्वारा विवाद की समानांतर सुनवाई के समान होगा।
दिल्ली हाईकोर्ट ने फिलहाल रिट याचिका पर नोटिस जारी नहीं किया है। मामले को 29 अक्टूबर 2026 को आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।