
Designer Baby: हर माता-पिता की इच्छा होती है कि उनका होने वाला बच्चा स्वस्थ, सुंदर और बुद्धिमान हो। लेकिन शिशु के जन्म से पहले डॉक्टर आपसे पूछे कि बच्चे की आंखों का रंग कैसा रखना है, लंबाई और बुद्धिमत्ता कितनी हो? इतना ही नहीं बच्चा दिल की बीमारी, डायबिटीज या कैंसर जैसे खतरों से भी मुक्त रहे। तो एक आम परिवार के लिए यह किसी जादुई सपने जैसा लग सकता है। कुछ समय पहले तक यह सवाल विज्ञान कथाओं और हॉलीवुड फिल्मों तक सीमित था, लेकिन यह बहस अब प्रयोगशाला तक पहुंच गई, जहां हाल ही अमरीकी वैज्ञानिकों ने पहली बार मानव भ्रूणों में नई जीन एडिटिंग तकनीक ‘बेस एडिटिंग’ के जरिए इसे सच करने का दावा किया है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अभी यह शोध तक सीमित है और नियमित चिकित्सीय उपयोग अभी कई वर्ष दूर है। ग्रैंड व्यू रिसर्च, फॉच्र्यून बिजनेस इनसाइट, आइसीएमआर के अनुसार इसके लिए अभी मोजेकिज्म (आनुवांशिक उत्परिवर्तन), नैतिकता और कानूनी मंजूरी जैसी चुनौतियां हैं।
इस शोध से दुनिया में ये बहस तेज हो गई कि यदि विज्ञान जन्म से पहले आनुवांशिक बीमारियां खत्म कर सकता है, तो क्या भविष्य में मनचाहे गुणों वाले 'डिजाइनर बेबी' बनाए जाएंगे, जो प्रकृति के नियमों को हमेशा के लिए बदल सकता है। डिजाइनर बेबी का अर्थ ऐसे बच्चे से है, जिसके जन्म से पहले ही उसके माता-पिता और वैज्ञानिकों द्वारा उसकी आनुवांशिक संरचना में अपनी मर्जी के मुताबिक बदलाव करा दिया गया हो।
शरीर की हर कोशिका में मौजूद डीएनए में लाखों आनुवांशिक निर्देश होते हैं। जीन एडिटिंग इसमें आई गड़बड़ी को इसे ठीक करने का मौका देता है।
दुनिया में 7,000 से अधिक दुर्लभ आनुवांशिक बीमारियां पहचानी जा चुकी हैं। इनमें थैलेसीमिया, सिकल सेल एनीमिया और ड्यूशेन मस्कुल कई बीमारियों का स्थायी इलाज नहीं है। यदि भ्रूण अवस्था में ही दोषपूर्ण जीन को ठीक किया जा सके तो बच्चा जन्म से ही इन बीमारियों से मुक्त हो सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि फिलहाल इस तकनीक का उद्देश्य गंभीर बीमारियों की रोकथाम है, न कि मनचाहे गुणों वाले बच्चे तैयार करना।
2018 में चीन के वैज्ञानिक हे जियानकुई ने एचआईवी संक्रमण का जोखिम कम करने के लिए भ्रूण के क्रिस्पर5 जीन में बदलाव कर दुनिया के पहले जीन-संपादित जुड़वां बच्चों के जन्म का दावा किया था। इस प्रयोग की दुनिया भर में कड़ी आलोचना हुई, बाद में उन्हें जेल की सजा भी हुई। इसके बाद ज्यादातर देशों ने भ्रूण की जीन एडिटिंग पर बैन किया।
क्रिस्पर आधारित जीन एडिटिंग तकनीकों का वैश्विक बाजार फिलहाल करीब 3.2 अरब डॉलर (लगभग 26 हजार करोड़ रुपए) का आंका गया है। विभिन्न बाजार अध्ययनों के अनुसार 2035 तक इसके 28 अरब डॉलर (करीब 2.3 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंचने का अनुमान है।
भारत में आईसीएमआर और जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के दिशा-निर्देशों के तहत मानव भ्रूण (जर्मलाइन) की जीन एडिटिंग का चिकित्सीय उपयोग प्रतिबंधित है। हालांकि देश में आइवीएफ, जेनेटिक टेस्टिंग और जीन आधारित चिकित्सा का बाजार तेजी से बढ़ रहा है।