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NEET UG Paper Leak: छात्रों का आक्रोश, घिरती सरकार और बड़ा सियासी दांव: क्या धर्मेंद्र प्रधान की विदाई के पीछे है BJP की मास्टरस्ट्रैटेजी?

Jantar Mantar Student Protest : नीट विवाद और जंतर-मंतर पर धधकते आंदोलन के बीच धर्मेंद्र प्रधान की विदाई केवल नैतिक जिम्मेदारी या दबाव का नतीजा नहीं है। मानसून सत्र को बचाने और परिसीमन (Delimitation Bill) जैसे अपने सबसे बड़े संसदीय मिशन को पार लगाने के लिए सत्तारूढ़ दल ने राजनीतिक शतरंज की यह सबसे बड़ी चाल चली है।
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Dharmendra Pradhan Resignation
Dharmendra Pradhan Resignation

Dharmendra Pradhan Resignation: देश की राजनीति में जब भविष्य की बिसात बिछाई जाती है, तो बड़े से बड़े मोहरे की कुर्बानी देने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई जाती। लंबे समय से घमासान का केंद्र बने शिक्षा मंत्रालय और नीट-यूजी (NEET-UG) पेपर लीक विवाद के बाद अब धर्मेंद्र प्रधान का पद से हटना महज एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल की एक सोची-समझी टैक्टिकल रिट्रीट (रणनीतिक वापसी) मानी जा रही है।

सीबीएसई की ऑनलाइन मार्किंग योजना में हुई गड़बड़ियों और उसके बाद देश भर के छात्रों के सड़कों पर उतरने से सरकार बैकफुट पर थी। जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के अनशन और छात्रों पर पुलिस के बल प्रयोग ने इस जनाक्रोश की आग में घी डालने का काम किया। लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस फैसले को टालने की कोशिश पार्टी परंपरा और मिसाल के डर से कर रही थी, उस पर अचानक मुहर क्यों लगानी पड़ी?

जंतर-मंतर से संसद तक: क्यों बैकफुट पर आई सरकार?

जुलाई में शुरू हुआ संसद का मानसून सत्र पहले ही दिन से हंगामे की भेंट चढ़ रहा था। विपक्ष ने शिक्षा व्यवस्था में आई इस गिरावट को लेकर सरकार की घेराबंदी कर दी थी। आंदोलन की गंभीरता को देखते हुए वरिष्ठ मंत्रियों जे.पी. नड्डा और जितेंद्र सिंह को सीधे मध्यस्थता के लिए उतरना पड़ा।

यह कोई पहली बार नहीं है जब मोदी सरकार ने जनदबाव में रणनीतिक कदम पीछे खींचे हों। इससे पहले:

कृषि कानून: लंबे समय तक चले किसान आंदोलन के बाद तीन कृषि कानूनों को वापस लिया गया था।

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश: जनविरोध को देखते हुए पूर्व में इस पर भी सरकार ने कदम पीछे खींचे थे।

जंतर-मंतर पर बिगड़ते हालात और विपक्ष को मिल रहे राजनीतिक ईंधन ने सरकार को यह अहसास करा दिया था कि यदि इस विवाद को तुरंत शांत नहीं किया गया, तो उसके बड़े संसदीय एजेंडे पूरी तरह ध्वस्त हो सकते हैं।

असली खेल: परिसीमन विधेयक और 2026 की भावी राजनीति

सूत्रों और राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा दरअसल संसद में एक बड़े लक्ष्य को साधने के लिए दिया गया बलिदान है। सरकार का सबसे बड़ा ध्यान इस मानसून सत्र में बहुचर्चित परिसीमन विधेयक (Delimitation Bill) को पारित कराने पर केंद्रित है।

संसदीय आंकड़ों का समीकरण:

लोकसभा: 2024 के आम चुनावों के बाद एनडीए (NDA) का आंकड़ा जो 293 पर था, विपक्षी दलों में टूट और निर्दलीय समर्थनों के बल पर बढ़कर 318 के करीब पहुंच चुका है।

राज्यसभा: जून 2024 में 101 सदस्यों के आंकड़े से बढ़कर यह संख्या अब 152 तक पहुंच गई है।

अप्रैल में इसी तरह के एक प्रयास के दौरान संविधान संशोधन विधेयक आवश्यक दो-तिहाई बहुमत न मिल पाने के कारण अटक गया था। लेकिन अब बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य, मजबूत संख्या बल और क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ जारी रणनीतिक बातचीत के बीच सरकार कोई भी जोखिम नहीं लेना चाहती थी।

अहंकार या रणनीति: देरी से लिया गया सही फैसला?

राजनीतिक हलकों में अब यह सवाल भी तैर रहा है कि जब छात्रों का गुस्सा चरम पर था, तब यह फैसला लेने में इतनी देरी क्यों की गई? क्या किसी भी राजनीतिक दल के लिए उसकी अपनी प्रतिष्ठा और अहंकार समय रहते जनता की आवाज सुनने के आड़े आ जाता है?

बहरहाल, जंतर-मंतर की आग को शांत करके सरकार ने मानसून सत्र के सुचारू संचालन का रास्ता साफ कर लिया है। प्रधान के इस्तीफे के साथ ही बीजेपी ने यह साफ कर दिया है कि उसकी नजर आज की साख बचाने से ज्यादा कल के बड़े सियासी लक्ष्यों पर टिकी हुई है।

Updated on:
26 Jul 2026 01:21 pm
Published on:
26 Jul 2026 01:05 pm