
E10 Marine Fuel: भारत सरकार ने समुद्री क्षेत्र से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने के लिए तटीय व्यापार में चलने वाले जहाजों के लिए 10 फीसदी बायोफ्यूल मिश्रण अनिवार्य करने का प्रस्ताव रखा है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत 1 जनवरी 2028 से जहाजों को 10 फीसदी तक बायोफ्यूल मिश्रित ईंधन इस्तेमाल करने के लिए बढ़ावा दिया जाएगा, जबकि 1 जनवरी 2029 से भारतीय तटीय व्यापार में चलने वाले संबंधित जहाजों के लिए कम से कम 10 फीसदी बायोफ्यूल मिश्रण का इस्तेमाल जरूरी होगा।
यह प्रस्ताव समुद्री क्षेत्र के डीकार्बोनाइजेशन को बढ़ावा देने के लिए जारी किए गए एक ड्राफ्ट रोडमैप का हिस्सा है। डाक्यूमेंट्स बुधवार को डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ मरीन एडमिनिस्ट्रेशन (DGMA) की ओर से जारी किया गया।
ड्राफ्ट रोडमैप का उद्देश्य समुद्री परिवहन में नवीकरणीय और कम कार्बन वाले ईंधनों के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। सरकार का मानना है कि बायोफ्यूल और पारंपरिक समुद्री ईंधनों के मिश्रण से मौजूदा जहाजों में बड़े तकनीकी बदलाव किए बिना उनके लाइफसाइकिल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। यह प्रस्ताव नेशनल मैरीटाइम डीकार्बोनाइजेशन पॉलिसी फ्रेमवर्क (NMDPF), नेशनल पॉलिसी ऑन बायोफ्यूल्स, 2018 और भारत के व्यापक समुद्री डीकार्बोनाइजेशन लक्ष्यों के अनुरूप तैयार किया गया है।
DGMA के प्रस्ताव के अनुसार, 1 जनवरी 2028 से भारतीय तटीय व्यापार में लगे सभी जहाजों को MGO, VLSFO या FO के साथ 10 फीसदी तक बायोफ्यूल मिश्रण इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। यह व्यवस्था ईंधन की उपलब्धता, जहाज की तकनीकी अनुकूलता, सुरक्षा, इंजन या उपकरण निर्माता की सिफारिशों और लागू कानूनी नियमों के अधीन होगी।
इसके बाद 1 जनवरी 2029 से नोटिस के दायरे में आने वाले हर जहाज को तटीय व्यापार के दौरान अपने प्रोपल्शन और सहायक मशीनरी के लिए कम से कम 10 फीसदी बायोफ्यूल मिश्रित समुद्री ईंधन इस्तेमाल करना होगा। हालांकि, प्रस्तावित नियमों में कुछ छूट और असाधारण परिस्थितियों के प्रावधान भी रखे गए हैं।
प्रस्तावित व्यवस्था भारतीय तटीय व्यापार में लगे उन सभी जहाजों पर लागू होगी, चाहे उनका झंडा किसी भी देश का हो, जिन्हें भारत के तटीय व्यापार में संचालन के लिए लाइसेंस या अनुमति लेना जरूरी है। यह नियम मरीन गैस ऑयल (MGO), वेरी लो सल्फर फ्यूल ऑयल (VLSFO) और फ्यूल ऑयल (FO) समेत निर्धारित पारंपरिक समुद्री ईंधनों का इस्तेमाल करने वाले जहाजों पर लागू होगा। इसका असर जहाज मालिकों, मैनेजरों, ऑपरेटरों, चार्टरर्स, मास्टर्स, बंकर सप्लायर्स और ईंधन उत्पादकों व ब्लेंडर्स समेत समुद्री ईंधन की खरीद, मिश्रण, आपूर्ति और इस्तेमाल से जुड़े अन्य पक्षों पर भी पड़ेगा।