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भारत की ‘देसी’ इंजीनियरिंग के आगे हीटवेव फेल!

Heatwave Crisis: दुनियाभर के कई देशों में हीटवेव से लोगों के हाल बेहाल हैं। फ्रांस में तो परमाणु रिएक्टरों को भी बंद करना पड़ा। वहीँ भारत में हालात ऐसे नहीं हैं।
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Jul 16, 2026
Rawatbhata nuclear reactor
राजस्थान का रावतभाटा परमाणु रिएक्टर (File Photo)

दुनियाभर में कई देशों के इन दिनों आसमान से बरसती आग यानी हीटवेव (Heatwave) ने एक नया संकट खड़ा कर दिया है। फ्रांस की मशहूर नदियों गारोन, रोन और म्यूज के किनारे स्थित तीन परमाणु रिएक्टरों को इस हफ्ते अचानक बंद करना पड़ा क्योंकि इन्हें ठंडा करने वाली नदियों का पानी इतना गर्म हो चुका था कि उसे छूना भी मुश्किल था। लेकिन भारत में यह संकट नहीं है। भारत (India) ने भी हाल ही में रिकॉर्डतोड़ हीटवेव का सामना किया है, जहाँ बिजली की मांग 270 गीगावॉट को पार कर गई थी। तो क्या हमारे परमाणु रिएक्टर भी बंद होने की कगार पर हैं? जवाब है - नहीं। इसका कारण भारत की बेहतरीन 'देसी इंजीनियरिंग' (Desi Engineering) और रणनीतिक चयन है।

तटीय संयंत्र: समुद्र का 'थर्मल कवच'

भारत की परमाणु क्षमता का एक बड़ा हिस्सा समुद्र के किनारे स्थित है, जिसमें तमिलनाडु के कुडनकुलम और कलपक्कम संयंत्र और महाराष्ट्र का तारापुर संयंत्र शामिल हैं। कलपक्कम में भारत के सबसे उन्नत 500 मेगावॉट के प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर ने बीते दिनों क्रिटिकलिटी हासिल कर एक नया मील का पत्थर गाड़ा है।

क्या है फायदा?

तटीय संयंत्र सीधे समुद्र से पानी लेते हैं। नदियों की तुलना में समुद्र का जलस्तर और थर्मल मास इतना विशाल होता है कि हीटवेव के कारण समुद्र का तापमान इतनी जल्दी नहीं बदलता।

मैदानी संयंत्र: 'कूलिंग टावर' की ढाल

भारत के जो रिएक्टर जमीन के अंदरूनी हिस्सों में हैं, जैसे राजस्थान का रावतभाटा, उत्तर प्रदेश का नरोरा और गुजरात का काकरापार, उन्हें देश की उष्णकटिबंधीय गर्मी को ध्यान में रखकर ही बनाया गया था।

क्या है फायदा?

मैदानी संयंत्र नदियाँ गर्म होने पर बिजली बनाना बंद नहीं करते, क्योंकि ये पानी को वापस सीधे नदी में नहीं छोड़ते। इसके बजाय ये विशाल 'नेचुरल ड्राफ्ट कूलिंग टावर्स' का इस्तेमाल करते हैं, जो गर्मी को पानी के माध्यम से नदी में डालने के बजाय वाष्पीकरण से सीधे हवा में छोड़ देते हैं।

भारत के लिए क्या है असली चुनौती?

भारत के रिएक्टरों के लिए असली खतरा पानी का गर्म होना नहीं, बल्कि पानी का खत्म होना यानी सूखा है। कूलिंग टावरों को लगातार पानी की ज़रूरत होती है जिससे वाष्पीकृत होने वाले पानी की भरपाई की जा सके। अगर भीषण हीटवेव के साथ भयंकर सूखा पड़ता है और जलाशयों का पानी सूख जाता है, तो रिएक्टरों को बंद करना पड़ सकता है। भारत पहले भी सूखे के कारण अपने कोयला और गैस आधारित बिजली संयंत्रों को बंद होते देख चुका है।