
Gwalior High Court: हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने पीडब्ल्यूडी मध्यप्रदेश में गुना के कामकाज पर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा लगता है कि राज्य के विभाग प्रथम श्रेणी के सक्षम अधिकारियों से नहीं, बल्कि तृतीय श्रेणी के कर्मचारियों (क्लर्कों) से चल रहे हैं। अनुकंपा नियुक्ति के मामले में कोर्ट को गुमराह करने और फर्जी तरीके से प्रभारी अधिकारी (ओआईसी) बनने पर अदालत ने कार्यपालन यंत्री केएस उइके और यूडीसी शरद श्रीवास्तव पर 50-50 हजार रुपए की व्यक्तिगत कॉस्ट लगाई है।
लोक निर्माण विभाग के प्रमुख सचिव को दोनों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने के संबंध में 15 दिन में निर्णय लेकर रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं। यह आदेश शिवराम शर्मा की रिट अपील पर जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की डिवीजन बेंच ने दिया। इस टिप्पणी के बाद राज्य के प्रशासनिक अमले में खलबली मच गई है, क्योंकि यह सीधे तौर पर शीर्ष अधिकारियों की कार्यप्रणाली और उनकी मॉनिटरिंग क्षमता पर सवाल खड़े करता है।
अनुकंपा नियुक्ति के लिए शिवराम शर्मा की ओर से याचिका दायर की गई थी। बाबू शरद श्रीवास्तव ने शपथपत्र में कहा था कि मुख्य अभियंता कार्यालय, ग्वालियर से आया पत्र उनकी टेबल पर गुम हो गया था और आवेदक के नाम से कोई फाइल नहीं थी।
उन्होंने शिवराम को अनुकंपा नियुक्ति के लिए अपात्र भी बताया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पत्र मांगा तो बाबू ने उसका प्रिंटआउट पेश कर दिया। पूछने पर उन्होंने स्वीकार किया कि पत्र ईमेल से मिला था। कोर्ट ने उनके बयान को प्रथम दृष्टया झूठा और भ्रामक माना।
कोर्ट ने आवक-जावक रजिस्टर तलब किए थे, लेकिन ईई और बाबू केवल आवक रजिस्टर लेकर पहुंचे। जावक रजिस्टर पेश नहीं किया। ईई केएस उइके ने खुद को ओआईसी बताते हुए शपथपत्र और आवेदन भी पेश किया। कोर्ट ने नियुक्ति आदेश मांगा तो उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें ओआईसी नियुक्त ही नहीं किया गया था। अदालत ने इसे कोर्ट को गुमराह करने और गंभीर अनियमितता मानते हुए दोनों अधिकारियों पर व्यक्तिगत कॉस्ट लगाई। ग्वालियर हाईकोर्ट ने गुना जिले के एक मामले की सुनवाई करते हुए प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर रुख अपनाया। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि बड़े अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों को सही से नहीं निभा रहे हैं और पूरा काम बाबुओं के भरोसे छोड़ दिया गया है।