
हिमालय की घाटियों में बाढ़ से फिर कई जानें चली गईं हैं। नेपाल और तिब्बत की सीमा पर बुधवार को आई भयानक बाढ़ से नौ लोगों की मौत हो गई है। गांव बह गए, सड़कें-पुल टूट गए और बिजली परियोजनाएं क्षतिग्रस्त हो गईं। अधिकारियों को अभी और मौतों का डर सता रहा है।
हालांकि, यह कोई नई बात नहीं। पिछले 12 सालों में हिमालय क्षेत्र बार-बार ऐसी तबाही झेल चुका है। कुछ विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन और बेतहाशा निर्माण को इसकी वजह बताते हैं।
अगस्त 2025 में उत्तराखंड में अचानक आई बाढ़। भूस्खलन ने चार लोगों की जान ले ली। दर्जनों लोग लापता हो गए। इससे पहले सितंबर 2024 में नेपाल में लगातार बारिश से बाढ़ और लैंडस्लाइड आए। इसमें 66 लोग मारे गए।
अक्टूबर 2023 में सिक्किम में भारी बारिश से ग्लेशियल लेक फट गई। भयंकर बाढ़ में 179 लोगों की मौत हो गई। नवंबर 2023 में उत्तराखंड के एक सड़क सुरंग में 41 मजदूर फंस गए। 17 दिन बाद उन्हें बचाया गया। ये मजदूर देश के विभिन्न राज्यों से आए थे। सुरंग क्यों धंसी, इसका कोई साफ जवाब अधिकारियों ने नहीं दिया।
जनवरी 2023 में जोशीमठ में सैकड़ों मकानों में दरारें पड़ गईं। करीब 200 लोगों को घर छोड़ना पड़ा। कई इमारतें तोड़ दी गईं क्योंकि वे असुरक्षित हो गई थीं।
रॉयटर्स ने भूवैज्ञानिक और स्थानीय लोगों के हवाले से बताया कि तेज निर्माण ने जमीन और इमारतों को कमजोर कर दिया। फरवरी 2021 में उत्तराखंड में आई अचानक बाढ़ ने 200 से ज्यादा लोगों की जान ले ली। दो जलविद्युत परियोजनाएं बह गईं।
धौलीगंगा नदी की घाटी में पानी, पत्थर और मलबा उमड़ पड़ा। अक्टूबर 2021 में भी बेमौसम भारी बारिश से सड़कें डूबीं, पुल बह गए और कम से कम 46 लोगों की मौत हुई।
सितंबर 2014 में कश्मीर में 50 साल की सबसे बड़ी बाढ़ आई। झेलम नदी में उफान आ गया। भारत में करीब 200 और पाकिस्तान में 264 लोगों की जान चली गई।
हिमालय की ये घटनएं साफ दिखाती हैं कि पहाड़ों पर दबाव बढ़ रहा है। सड़कें, सुरंगें, बिजली परियोजनाएं और घर तेजी से बन रहे हैं। साथ ही मौसम भी बदल रहा है।
बारिश का पैटर्न बिगड़ रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं। स्थानीय लोग कहते हैं कि विकास जरूरी है, लेकिन प्रकृति की सीमा का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।