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पेट्रोल-डीजल ही नहीं, दवा और खेती पर भी गिरेगी गाज! होर्मुज संकट से भारत को होगा सबसे बड़ा नुकसान, यहां समझें

Hormuz Strait crisis impact on India: होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव का भारत पर क्या असर पड़ेगा? जानें कैसे तेल, गैस, दवा, खेती और व्यापार पर पड़ सकता है गहरा प्रभाव और क्यों बढ़ी चिंता।

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Apr 12, 2026
Impact of Strait of Hormuz Crisis on India (Image: IANS)

Impact of Strait of Hormuz Crisis on India: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अनिश्चितता ने भारत की चिंता बढ़ा दी है। इस्लामाबाद में अमेरिका-ईरान वार्ता विफल होने के बाद हालात और गंभीर हो गए हैं। रक्षा विशेषज्ञ पीके सहगल का कहना है कि चाहे होर्मुज जलडमरूमध्य खुले या बंद रहे, आने वाले समय में भारत को सबसे ज्यादा नुकसान झेलना पड़ सकता है। उनके मुताबिक, यह संकट सिर्फ तेल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दवाओं, खेती, उद्योग और वैश्विक व्यापार तक इसका असर देखने को मिलेगा।

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आने वाला समय बहुत भयानक होगा

पीके सहगल ने मौजूदा हालात को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि यह संकट पूरी दुनिया के लिए चुनौतीपूर्ण है, लेकिन भारत पर इसका असर ज्यादा गहरा होगा। उन्होंने कहा, ''भारत ने फिलहाल कुछ इंतजाम कर लिए हैं, लेकिन लंबे समय में सबसे ज्यादा नुकसान भारत को ही होगा।'' उनके अनुसार, ईरान में रिफाइनरी, पाइपलाइन और पोर्ट जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचा है और इन्हें दोबारा खड़ा करने में कई साल लग सकते हैं, जिससे सप्लाई चेन पर लंबा असर पड़ेगा।

तेल और गैस सप्लाई पर सीधा असर

भारत की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट पर निर्भर है। सहगल के मुताबिक, भारत का करीब 59 प्रतिशत कच्चा तेल, 88 प्रतिशत एलपीजी और 20 प्रतिशत एलएनजी इसी क्षेत्र से आता है। ऐसे में अगर होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा आती है, तो इसका सीधा असर देश की ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ेगा और पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हो सकती है।

खेती और खाद पर असर

यह संकट कृषि क्षेत्र को भी प्रभावित कर सकता है। भारत में किसानों के लिए जरूरी यूरिया और फर्टिलाइजर के करीब 40 प्रतिशत कच्चे माल की आपूर्ति इसी क्षेत्र से होती रही है। अगर सप्लाई बाधित होती है, तो खाद की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, जिसका असर सीधे खेती और उत्पादन पर पड़ेगा।

दवा और उद्योग पर संकट

भारत जेनेरिक दवाओं का बड़ा उत्पादक है, लेकिन इसके लिए जरूरी कच्चे माल का 35 से 40 प्रतिशत हिस्सा मिडिल ईस्ट से आता है। इसी तरह प्लास्टिक उद्योग के लिए भी इतना ही कच्चा माल इसी क्षेत्र पर निर्भर है। ऐसे में सप्लाई में रुकावट आने पर दवाओं और औद्योगिक उत्पादों की कीमतों में इजाफा हो सकता है।

हाई-टेक सेक्टर पर असर

सहगल ने यह भी बताया कि भारत के सेमीकंडक्टर सेक्टर के लिए जरूरी हीलियम का करीब 45 प्रतिशत हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। ऐसे में अगर यह सप्लाई बाधित होती है, तो देश के हाई-टेक और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर भी इसका असर पड़ सकता है।

रेमिटेंस और व्यापार पर दबाव

मिडिल ईस्ट में काम कर रहे भारतीयों से देश को हर साल 65 से 70 बिलियन डॉलर का रेमिटेंस मिलता रहा है। मौजूदा हालात में इस पर भी असर पड़ सकता है। इसके अलावा फ्रेट और इंश्योरेंस लागत बढ़ने से व्यापार महंगा होगा और सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ेगा।

रणनीतिक परियोजनाओं पर असर

इस संकट का असर भारत की कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर भी पड़ सकता है। इंडिया-मिडिल ईस्ट इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC), यूएई-यूएसए-इंडिया-इजरायल (I2U2) पहल, चाबहार पोर्ट के जरिए अफगानिस्तान से जुड़ाव और नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर जैसे प्रोजेक्ट प्रभावित हो सकते हैं, जिससे क्षेत्रीय और वैश्विक व्यापार पर असर पड़ेगा।

होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ता तनाव भारत के लिए बहुस्तरीय चुनौती बनकर उभर रहा है। यह सिर्फ तेल और गैस तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि, दवा, उद्योग, तकनीक और वैश्विक व्यापार तक इसका असर फैल सकता है। ऐसे में अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो भारत को आने वाले समय में एक बड़े आर्थिक और रणनीतिक झटके का सामना करना पड़ सकता है।

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