
Clean Energy Cooking: एलपीजी की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में चल रहे संकट के बीच खाना पकाने के लिए एक नया विकल्प सामने आया है। भारत में अब पानी से हाइड्रोजन बनाकर स्टोव चलाने की तकनीक पर काम हो रहा है। फरीदाबाद की GreenVize समेत कई कंपनियां ऐसे हाइड्रोजन स्टोव तैयार कर रही हैं। ये स्टोव LPG की जगह इस्तेमाल किए जा सकते हैं, लेकिन इनकी ज्यादा कीमत और लंबे समय के इस्तेमाल से जुड़ी जानकारी अभी बड़ी चुनौती है।
बिहार के वैशाली जिले के रहने वाले विकास कुमार की कहानी इस बदलाव का सीधा उदाहरण है। एलपीजी सप्लाई घटने के दौरान जब एक सिलेंडर के लिए भारी रकम चुकाने की नौबत आई और घंटों लाइन में लगना पड़ा, तब उन्होंने एक बार का ऐसा निवेश करने का सोचा जो हर महीने की भागदौड़ से मुक्ति दिला दे। उन्होंने फरीदाबाद स्थित एक टेक स्टार्टअप का पानी से चलने वाला 'हाइड्रोजन स्टोवटॉप' खरीदा। अब वे बिना किसी सिलेंडर के अपने घर में रोज का खाना आसानी से पका रहे हैं।
वैज्ञानिक नजरिए से देखें तो हाइड्रोजन ब्रह्मांड में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, लेकिन यह पानी के रूप में मौजूद रहती है। इस स्टोव में एक इन-बिल्ट PEM (प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन) इलेक्ट्रोलाइजर लगा होता है।
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसे जलाने पर कोई जहरीला धुआं या कार्बन नहीं निकलता, बल्कि उप-उत्पाद (By-product) के रूप में केवल शुद्ध जलवाष्प बनती है।
इस स्वदेशी तकनीक को मजबूत बनाने में भारतीय संस्थानों की बड़ी भूमिका है। IIT बॉम्बे के ऊर्जा विज्ञान विभाग ने हाल ही में 25 किलोवाट क्षमता वाली सौर ऊर्जा से संचालित ग्रीन हाइड्रोजन इकाई का सफल प्रदर्शन किया था। इस सिस्टम से रोज 2.5 से 3 किलो ग्रीन हाइड्रोजन बनी, जिससे संस्थान की कैंटीन में रोजाना 200 से 250 लोगों का खाना तैयार किया गया।
उधर, मार्च 2026 में इस तकनीक को व्यावसायिक पहचान तब मिली जब 'GreenVize' नामक स्टार्टअप ने अपना पहला स्टोव भारतीय सेना को सौंपा। फिलहाल यह स्टोव जम्मू और लद्दाख के अत्यधिक ऊंचाई वाले सैन्य इलाकों में सफलतापूर्वक इस्तेमाल हो रहा है। इसके अलावा मेघालय में रेस्टोरेंट चलाने वाले कमर्शियल यूजर भी इसे पारंपरिक एलपीजी से तेज और ज्यादा सुरक्षित मान रहे हैं।
हालांकि, वर्तमान में इस नई तकनीक को अपनाना हर आम भारतीय के लिए थोड़ा खर्चीला है।
जानकारों का मानना है कि फिलहाल शुरुआती और एक्सक्लूसिव प्रोडक्ट होने के कारण इसकी लागत ज्यादा है। जैसे ही बड़े पैमाने पर (Mass Production) इसका विनिर्माण शुरू होगा, कीमतें तेजी से नीचे आएंगी।
भारत सरकार के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (वर्ष 2030 तक 50 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य) के तहत इस सेक्टर को बढ़ावा दिया जा रहा है। नीदरलैंड्स की कंपनियों के साथ हुए रणनीतिक समझौतों के तहत भारत को हाइड्रोजन कुकस्टोव का ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने की तैयारी है।
निर्माता कंपनियों का लक्ष्य जल्द ही इसमें AI और IoT तकनीक जोड़कर इसे वाई-फाई व मोबाइल ऐप आधारित 'स्मार्ट स्टोव' बनाने का है। साथ ही, मालदीव जैसे पड़ोसी देशों से इसके अंतरराष्ट्रीय निर्यात की शुरुआत भी की जा रही है।