
अहमदाबाद। सजा पूरी होने के बाद भी पाकिस्तान की जेलों में बंद 178 भारतीय मछुआरों के परिजनों ने तत्काल रिहाई और स्वदेश वापसी की मांग की है। नेशनल फिशवर्कर्स फोरम (एनएफएफ) के अनुसार इस समय पाकिस्तान की जेलों में 198 भारतीय मछुआरे बंद हैं। इनमें से 10 की सजा 16 जुलाई 2021, 115 की 16 मार्च 2022, 21 की 17 नवंबर 2022, 10 की 31 जनवरी 2023 और 22 की 18 जुलाई 2024 को पूरी हो चुकी है। इन मछुआरों में ज्यादातर गुजरात के गिर सोमनाथ, देवभूमि द्वारका, पोरबंदर, जामनगर व दक्षिण गुजरात के वलसाड तथा केंद्र शासित प्रदेश दीव-दमण के शामिल हैं। अंतिम बार फरवरी 2025 में पाकिस्तान ने भारत के 22 मछुआरों को रिहा किया था।
भारत और पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दोनों देशों के जेलों में बंद मछुआरों के परिजनों तथा नेशनल फिशवर्कर्स फोरम (एनएफएफ), पाकिस्तान-इंडिया पीपुल्स फोरम फॉर पीस एंड डेमोक्रेसी और पाकिस्तान फिशरफोक फोरम ने भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों को संयुक्त पत्र भेजकर सजा पूरी कर चुके तथा राष्ट्रीयता सत्यापित हो चुके सभी मछुआरों की तत्काल रिहाई और स्वदेश वापसी की मांग की है।
एनएफएफ के उपाध्यक्ष सह समस्त माछीमार समाज गुजरात के महासचिव उस्मानगनी शेरासिया ने कहा कि मछुआरों की लंबे समय तक हिरासत से उन्हें ही नहीं, बल्कि उनके परिवारों को भी आर्थिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। अनुमान के मुताबिक हर साल चार से पांच भारतीय मछुआरों की पाकिस्तान की जेलों में मौत हो जाती है। पिछले साल मार्च में एक भारतीय मछुआरे ने जेल में आत्महत्या भी कर ली थी। पकड़े जाने के बाद इन्हें अधिकतम छह महीने की सजा दी जाती है, लेकिन ये सभी कई वर्षों से जेल में बंद हैं।
गिर सोमनाथ जिले की कोडिनार तहसील के कोतरा गांव की धनीबेन बामनिया ने बताया कि उनका पुत्र कपिल (22) और दामाद रामजी (45) दोनों पांच वर्ष से पाकिस्तान की जेल में बंद हैं। उनके घर में नेत्रहीन बेटी है। खुद वे घरों में काम कर गुजारा चला रही हैं। उन्होंने मांग की कि उनके पुत्र व दामाद दोनों को जल्द से जल्द रिहा कर दिया जाना चाहिए।
2008 के भारत-पाकिस्तान द्विपक्षीय कांसुलर एक्सेस समझौते की धारा 5 में स्पष्ट रूप से प्रावधान है कि राष्ट्रीयता की पुष्टि और सजा पूरी होने के बाद संबंधित व्यक्ति को एक महीने के भीतर रिहा कर स्वदेश भेजा जाना चाहिए। लेकिन इस प्रावधान को पूरी तरह लागू नहीं किया जा रहा है।
मछुआरा समुदाय के लिए काम करने वाले दीव के छगन बामणिया ने बताया कि जिस तरह श्रीलंका में पकड़े गए तमिलनाडु के मछुआरों और बंगलादेश में पकड़े गए बंगाल के मछुआरों का मुद्दा संबंधित राज्य सरकारें उठाती हैं उसी तरह गुजरात सरकार को भी यह मुद्दा विधानसभा में उठाना चाहिए। यहां के सांसदों को भी यह मुद्दा संसद में रखना चाहिए।
संगठनों के मुताबिक मछुआरे अक्सर रोजी-रोटी के लिए समुद्र में मछली पकड़ते समय अनजाने में अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा रेखा (आइएमबीएल) पार कर जाते हैं। पिछले दो वर्षों में दोनों देशों के मछुआरों ने आइएमबीएल की ओर जाने से परहेज किया है, जिसके कारण गिरफ्तारियों में काफी कमी आई है।
इन संगठनों ने सुझाव दिया कि ऐसे मामलों में, जहां मछुआरे अनजाने में समुद्री सीमा पार कर जाएं, दोनों देशों को 'नो अरेस्ट पॉलिसी' की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। इन संगठनों ने दोनों देशों के साथ ही समझौते का उल्लंघन कर होने वाली देरी के लिए जवाबदेही तय करने और भविष्य में ऐसी देरी रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनाने की मांग की गई है। संगठनों ने दोनों देशों के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इसे सद्भावना और मानवीय पहल के रूप में देखते हुए सभी पात्र मछुआरों की तत्काल रिहाई और स्वदेश वापसी की अपील की है।