पीएमओ का मुखिया तो पीएम होता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वहां का हर फैसला उसकी मर्जी से ही हो। कई बार टीम बनाने तक के मामले में उसकी नहीं चलती।
पीएमओ यानि, प्राइममिनिस्टर्स ऑफिस, देश का सबसे रसूख वाला ऑफिस होता है। इस ऑफिस से जुड़ी कई कहानियां होती हैं, जो दीवारों में ही कैद रह जाती हैं। कुछ बाहर भी आती हैं। साउथ ब्लॉक की दीवारों में भी कई कहानियां कैद हैं। अब वहां नई कहानियां नहीं बन पाएंगी, क्योंकि नया पीएमओ ‘सेवा तीर्थ कॉम्प्लेक्स’ में आ गया है। यहां की कहानियां कब बाहर निकलेंगी, पता नहीं। पर साउथ ब्लॉक की कुछ कहानियां जो किताबों की शक्ल में बाहर निकली हैं, यहां बता रहे हैं।
पीएमओ का मुखिया तो पीएम होता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वहां का हर फैसला उसकी मर्जी से ही हो। कई बार टीम बनाने तक के मामले में उसकी नहीं चलती। उनके मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू अपनी किताब 'The Accidental Prime Minister: The Making and Unmaking of Manmohan Singh' में लिखते हैं कि मनमोहन सिंह जिसे प्रिंसिपल सेक्रेटरी बनाना चाहते थे, उसे नहीं बना पाए थे।
बकौल बारू, टीकेए नायर उनकी पहली पसंद नहीं थे। वह चाहते थे एनएन वोहरा बनें। वोहरा मनमोहन की तरह पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान) के थे। दोनों ऑक्सफोर्ड के पढ़े थे और दोनों ने पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाया था। मनमोहन को पूरी उम्मीद थी कि वोहरा उनकी टीम में आ रहे हैं। वोहरा को लंदन जाना था। पीएमओ जॉइन करने की उम्मीद में उन्होंने यात्रा रद कर दी थी। लेकिन, सोनिया गांधी के दिमाग में किसी और का नाम था।
सोनिया एक रिटायर्ड तमिल आईएएस अफसर (बारू ने नाम नहीं बताया है) को बतौर प्रिंसिपल सेक्रेटरी पीएमओ लाना चाहती थीं। उन्होंने राजीव गांधी के साथ काम किया था और उनकी छवि ईमानदार अफसर की थी। लेकिन, उन्होंने सोनिया की पेशकश ठुकरा दी। पेशकश ठुकराने की वजह यह थी कि उन्होंने अपने पिता से रिटायरमेंट के बाद कोई सरकारी पद नहीं लेने का वादा किया था। इसके बाद मनमोहन सिंह ने नायर को चुना। मनमोहन सिंह को नायर का नाम उनके एक पारिवारिक मित्र रशपाल मल्होत्रा ने सुझाया था।
यही नहीं, मनमोहन सिंह के पीएमओ में जॉयंट सेक्रेटेरी पुलक चटर्जी भी सोनिया गांधी की पसंद के रूप में ही आए थे। चटर्जी राजीव और सोनिया, दोनों के साथ काम कर चुके थे। बारू लिखते हैं कि चटर्जी लगभग रोज सोनिया से मिलते थे और नीतिगत मसलों पर अपडेट देते व निर्देश लेते थे। वह सोनिया से पीएम और पीएमओ का एक मात्र संपर्क सूत्र थे।
(टीम बनाने का नरेंद्र मोदी का क्या तरीका है, यहां पढ़ सकते हैं।)
वकील और राजनयिक परमेश्वर नारायण (पीएन) हक्सर 6 मई, 1967 को इंदिरा गांधी से सेक्रेटेरी बने और 15 जनवरी,1973 तक रहे थे। वह पीएमओ के काम तक ही सीमित नहीं थे।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने दोनों के रिश्तों पर लिखी अपनी किताब Intertwined Lives में बताया है कि हक्सर को पद संभालने के एक हफ्ते बाद ही 14 मई, 1967 को इंदिरा ने हक्सर को एक खत के कुछ अंश भेजे। यह खत इंदिरा को छोटे बेटे संजय गांधी ने क्रीव से लिखा था। इसमें संजय ने बताया था कि हक्सर से उनकी बात हुई और बेनतीजा रही, क्योंकि उनकी राय भी आप (इंदिरा) जैसी ही थी।
असल में संजय गांधी को रॉल्स रॉयल कंपनी में अप्रेंटिसशिप के लिए भेजा गया था। वहां उनका मन नहीं लग रहा था। इंदिरा समझाने में नाकामयाब हो रही थीं। तब उन्होंने हक्सर से कहा था कि संजय को समझाएं। बाद में वहां से लौटने पर संजय को किस तरह मारुति कार बनाने का लाइसेंस मिला, वह अपने आप में अलग दास्तान है।
चार प्रधानमंत्रियों (एचडी देवेगौड़ा,आईके गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह) के साथ आठ साल (अगस्त 1996 से अगस्त 2004 तक) पीएमओ में जॉयंट सेक्रेटरी रहे जरनैल सिंह ने अपनी किताब With Four Prime Ministers: My PMO Journey में लिखा कि वाजपेयी सरकार में पीएमओ में फाइलें तेजी से और सटीक तरीके से निपटाई जाती थीं। सिंह लिखते हैं कि एक शाम कश्मीरी पंडितों के एक प्रतिनिधिमंडल से मिलने के बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बड़े निराश हो गए थे। कुछ देर बाद वह खड़े हुए और कहने लेगे, 'हे राम, हे राम! इस देश का क्या होगा?' उन्होंने यह भी लिखा कि वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते पीएमओ पर आरएसएस का कोई प्रभाव नहीं था और न ही उन्होंने आरएसएस के किसी नेता को लगातार प्रधानमंत्री से मिलने की कोशिश करते देखा।