राष्ट्रीय

ISRO की नई खोज: सूरज की गतिविधियों से बदल रही है सैटेलाइट की कक्षा, पुराने सैटेलाइट पृथ्वी की ओर गिर रहें

ISRO की स्टडी में खुलासा हुआ है कि सूरज की बढ़ती गतिविधियों से पृथ्वी का ऊपरी वातावरण फैलता है, जिससे पुराने Satellite और अंतरिक्ष मलबा तेजी से अपनी कक्षा छोड़कर धरती की ओर गिरने लगते हैं, और टकराव का खतरा बढ़ जाता है।

2 min read
May 06, 2026
सूरज की गतिविधियों से बदल रही है सैटेलाइट की कक्षा

ISRO Space Research: अंतरिक्ष में बढ़ता कचरा अब सिर्फ तकनीकी समस्या नहीं रहा, बल्कि प्रकृति की ताकत भी इसे प्रभावित कर रही है। एक नई स्टडी में खुलासा हुआ है कि जब सूर्य (Sun) अपनी तेज गतिविधि के दौर में होता है, तो पुराने सैटेलाइट (Satellite) और मलबा अपेक्षा से कहीं ज्यादा तेजी से पृथ्वी (Earth) की ओर खिसकने लगते हैं। यह खोज अंतरिक्ष में बढ़ते खतरे को और गंभीर बनाती है, जहां पहले से ही हजारों सैटेलाइट और टूटे हुए हिस्से मौजूद हैं।

ये भी पढ़ें

IIT मद्रास के स्टार्टअप का कमाल, दुनिया में पहली बार बनी Opto-SAR तकनीक, क्या और कैसे करेगी काम?

सौर गतिविधि बन रही है बड़ा कारण

वैज्ञानिकों के अनुसार, सूर्य जब अपने 11 साल के चक्र में ज्यादा सक्रिय होता है, तब उससे निकलने वाली पराबैंगनी किरणें (Ultraviolet Rays) और चार्ज कण पृथ्वी के ऊपरी वातावरण को गर्म और फैला देते हैं। इससे वातावरण का घनत्व बढ़ जाता है और लो अर्थ ऑर्बिट में मौजूद वस्तुओं पर ज्यादा घर्षण (Friction) लगता है। यही वजह है कि पुराने सैटेलाइट और मलबा धीरे-धीरे अपनी कक्षा खोने लगते हैं और नीचे की ओर खिसकते जाते हैं।

ISRO की रिसर्च में बड़ा खुलासा

थिरुवनंतपुरम स्थित इसरो के स्पेस फिजिक्स लेबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन किया है। रिसर्च में पाया गया कि जब सूर्य की गतिविधि अपने चरम के करीब 67% तक पहुंचती है, तब अंतरिक्ष मलबे की ऊंचाई कम होने की गति अचानक तेज हो जाती है। अध्ययन की प्रमुख वैज्ञानिक आयशा एम अशरूफ के मुताबिक, यह पहली बार है जब स्पष्ट रूप से यह साबित हुआ है कि सूर्य की गतिविधि का सीधा असर अंतरिक्ष कचरे की गति पर पड़ता है।

1960 के मलबे से मिली अहम जानकारी

इस अध्ययन में 17 ऐसे पुराने अंतरिक्ष मलबे का विश्लेषण किया गया, जिन्हें साल 1960 में लॉन्च किया गया था। इनकी कक्षा में बदलाव को 36 साल तक लगातार ट्रैक किया गया। ये सभी ऑब्जेक्ट्स 600 से 800 किलोमीटर की ऊंचाई पर पृथ्वी का चक्कर लगाते हैं और हर 90 से 120 मिनट में एक पूरा चक्कर लगाते हैं। चूंकि ये सक्रिय सैटेलाइट नहीं हैं, इसलिए ये पूरी तरह वातावरणीय बदलावों पर निर्भर रहते हैं।

अंतरिक्ष में टकराव का बढ़ता खतरा

आज लो अर्थ ऑर्बिट में सैटेलाइट्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है। स्टारलिंक जैसे बड़े नेटवर्क और पृथ्वी की निगरानी करने वाले सैटेलाइट पहले से ही इस क्षेत्र को बेहद भीड़भाड़ वाला बना चुके हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर एक भी बड़ा टकराव होता है, तो उससे हजारों नए टुकड़े बन सकते हैं, जो आगे और टकरावों का कारण बनेंगे। इसे 'कैस्केड इफेक्ट' कहा जाता है, जो पूरे अंतरिक्ष सिस्टम के लिए खतरा बन सकता है।

भविष्य की योजनाओं पर असर

यह खोज अंतरिक्ष मिशनों की योजना पर बड़ा असर डाल सकती है। अब सैटेलाइट लॉन्च करने से पहले सूर्य की गतिविधि को भी गंभीरता से ध्यान में रखना होगा। साथ ही, ईंधन की खपत और ऑर्बिट मैनेजमेंट पर भी ज्यादा ध्यान देना पड़ेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह शोध दिखाता है कि दशकों पुराने अंतरिक्ष मलबे भी आज विज्ञान को नई दिशा देने में मदद कर रहे हैं।

ये भी पढ़ें

एलन मस्क के रॉकेट से भारत का कमाल, ‘दृष्टि’ मिशन से भारत ने रचा नया इतिहास
Updated on:
06 May 2026 03:26 pm
Published on:
06 May 2026 03:25 pm
Also Read
View All