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जस्टिस ओका का बड़ा बयान – ‘न्यापालिका लोगों की अपेक्षा पर खरी नहीं उतर पाई’

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस अभय एस. ओका ने भारतीय न्यायपालिका के बारे में एक बड़ा बयान दिया है। क्या कहा जस्टिस ओका ने? आइए जानते हैं।
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Apr 01, 2026
Justice A.S. Oka
Justice A.S. Oka (Photo - ANI)

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस अभय एस. ओका ने कहा है कि भारतीय न्यायपालिका संविधान के तहत नागरिकों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाई है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से जजों की नियुक्ति के लिए की गई सिफारिश पर जल्द मंजूरी नहीं देना इसका एक प्रमुख कारण है। उन्होंने कहा कि व्यवस्था की आत्म-प्रशंसा अक्सर इस बात को नज़रअंदाज़ कर देती है कि आम वादी वास्तव में अदालतों का अनुभव कैसे करते हैं। अगर कोई यह कहे कि आम आदमी को न्यायपालिका पर बहुत भरोसा है तो यह बात न्यायिक क्षेत्र से बाहर के लोगों द्वारा कही जानी चाहिए, न कि वकीलों या जजों द्वारा।

न्याय का वादा तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक

जस्टिस ओका ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) की ओर से आयोजित 45वें जेपी स्मृति व्याख्यान में यह बात कही। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश का संविधान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की गारंटी देता है लेकिन यह वादा तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक कि अदालतें गुणवत्तापूर्ण और त्वरित न्याय प्रदान नहीं कर सकतीं।

जजों के पद नहीं भर रहे

जस्टिस ओका ने देश में जजों की संख्या और न्यायिक ढांचे के खराब होने पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जजों के पद नहीं भरे जा रहे। सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में दिए एक आदेश में कहा था कि जज-जनसंख्या अनुपात पांच साल में प्रति दस लाख लोगों पर 50 जज तक पहुंच जाना चाहिए लेकिन आज भी हम 22 या 23 के अनुपात पर संघर्ष कर रहे हैं। कुछ विकसित देशों में यह अनुपात 80-90 या उससे भी अधिक है। उन्होंने कहा कि विकसित भारत पर बात होती है लेकिन जज-जनसंख्या अनुपात पर चर्चा नहीं होती।

Updated on:
01 Apr 2026 08:04 am
Published on:
01 Apr 2026 08:03 am
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