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Sunetra Pawar Oath: पति की मौत के 3 दिन बाद ही क्यों बनीं डिप्टी सीएम ? जानें ‘पवार प्ले’ का इनसाइड सच

NCP Merger: अजित पवार के निधन के तुरंत बाद सुनेत्रा को डिप्टी सीएम बनाने की असली वजह सामने आई है। शरद पवार से डर और कानूनी पचड़ों ने नेताओं को इस जल्दबाजी पर मजबूर किया।

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Jan 31, 2026
सुनेत्रा पवार। ( फोटो : ANI)

Political Crisis: महाराष्ट्र की राजनीति में पिछले 72 घंटे किसी भूचाल से कम नहीं रहे। बुधवार को हुई विमान दुर्घटना में एनसीपी प्रमुख और उप मुख्यमंत्री अजित पवार के आकस्मिक निधन (Ajit Pawar Death) ने पूरे देश को हैरान कर दिया है। लेकिन, इस त्रासदी के बीच जिस तेजी से उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार को शनिवार शाम डिप्टी सीएम पद (Sunetra Pawar Deputy CM) की शपथ दिलाई गई, उससे कई सवाल पैदा हो गए हैं। शोक की घड़ी में भी राजनीतिक बिसात बिछाई गई। आखिर ऐसी क्या मजबूरी थी कि अजित पवार के दाह संस्कार के तुरंत बाद ही सत्ता का हस्तांतरण करना पड़ा? इसके पीछे की वजह केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि 'अस्तित्व बचाने' का एक बड़ा खेल (Maharashtra Political Crisis) है।

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विलय का डर और नेताओं की कुर्सी (NCP Merger Fear)

सियासी गलियारों के सूत्रों के मुताबिक, इस जल्दबाजी का सबसे बड़ा कारण शरद पवार की एनसीपी और अजित पवार गुट के बीच होने वाला संभावित विलय था। खबर है कि 17 जनवरी को दोनों गुटों में एक गुप्त समझौता हुआ था, जिसके तहत 12 फरवरी को पार्टी के एकीकरण का ऐलान होना था। अजित पवार के खेमे के दिग्गज नेता—प्रफुल्ल पटेल, छगन भुजबल और सुनील तटकरे—इस बात से डर गए थे कि अगर अजित दादा के बिना विलय हुआ, तो एकीकृत पार्टी पर पूरी तरह से शरद पवार (सीनियर पवार) का कब्जा हो जाएगा। ऐसे में अजित गुट के नेताओं का प्रभाव खत्म हो जाता। इसलिए, विलय की तारीख से पहले ही उन्होंने कमान अपने हाथ में रखने के लिए सुनेत्रा पवार को आगे कर दिया।

शरद पवार को रखा गया 'अंधेरे' में (Sharad Pawar Politics)

हैरानी की बात यह है कि सुनेत्रा पवार को पार्टी अध्यक्ष और विधायक दल का नेता चुनने के फैसले में एनसीपी के संस्थापक शरद पवार की कोई राय नहीं ली गई। शनिवार सुबह बारामती में शरद पवार ने अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए साफ कहा कि उन्हें इस फैसले की भनक तक नहीं थी। उन्हें प्रक्रिया से बाहर रखना यह साबित करता है कि अजित गुट के नेता सीनियर पवार के 'वीटो पावर' से बचना चाहते थे। वे जानते थे कि अगर शरद पवार बीच में आए, तो वे अपनी शर्तों पर पार्टी चलाएंगे।

जेल और जांच एजेंसियों का खौफ

अजित गुट के नेताओं की घबराहट के पीछे एक और बड़ी वजह 'कानूनी पचड़े' हैं। महायुति (BJP गठबंधन) में शामिल होने से पहले कई नेताओं पर ईडी (ED), सीबीआई (CBI) और एसीबी (ACB) की जांच चल रही थी। सत्ता में रहने की वजह से उन्हें इन एजेंसियों से राहत मिली हुई है। शरद पवार पहले ही कह चुके हैं कि वे किसी भी कीमत पर बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे। ऐसे में अगर पार्टी एक होती और एनडीए से बाहर आती, तो इन नेताओं पर फिर से कानूनी शिकंजा कसने का डर था। सत्ता और सुरक्षा बनाए रखने के लिए सुनेत्रा पवार की ताजपोशी जरूरी थी।

कमजोर नेतृत्व की तलाश ?

राजनीतिक पंडितों का मानना है कि सुनेत्रा पवार का चयन इसलिए भी किया गया, क्योंकि वे राजनीति में अपेक्षाकृत नई हैं। ध्यान रहे कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बारामती से अपनी ननद सुप्रिया सुले से हारने के बाद उनकी राजनीतिक पकड़ बहुत मजबूत नहीं मानी जाती। अजित गुट के वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि सुनेत्रा के नाम पर सहानुभूति मिलेगी, लेकिन असली 'रिमोट कंट्रोल' उनके हाथ में रहेगा। एक अनुभवहीन नेता के जरिये पार्टी पर पकड़ बनाए रखना इन दिग्गजों के लिए आसान होगा।

क्या यह सिर्फ एक अस्थायी व्यवस्था है ?

सुनेत्रा पवार को अजित पवार की लगभग सभी जिम्मेदारियां सौंप दी गई हैं, सिवाय वित्त मंत्रालय के। वित्त विभाग अब मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पास रहेगा। सियासी गलियारों में चर्चा है कि सुनेत्रा की यह नियुक्ति एक 'स्टॉप-गैप अरेंजमेंट' (अस्थायी व्यवस्था) हो सकती है। असली खेल तब शुरू होगा जब विलय की तारीख नजदीक आएगी।

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