
Minor Girls Pregnancy Cases: मेघालय में नाबालिग लड़कियों के गर्भवती होने के मामले में बढ़ोतरी हुई है। पाक्सो एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मामलों की संख्या भी बढ़ रही है। यही कारण है कि इस स्थिति को गंभीर मानते हुए मेघालय हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट जानना चाहता है कि युवाओं को 'POCSO एक्ट' के प्रोविजन मतलब कि कानून, इसे तोड़ने के नतीजे क्या हो सकते हैं? शिक्षा और कम उम्र में रिश्तों के जोखिमों के बारे में जागरूक (एजुकेट) करने के लिए राज्य सरकार क्या कदम उठा रही है?
दरअसल, मेघालय हाई कोर्ट की चीफ जस्टिस रेवती प्रशांत मोहिते डेरे एक POCSO मामले की सुनवाई कर रही थीं। इसी दौरान उन्होंने राज्य में बढ़ रहे टीनएज प्रेग्नेंसी के मामलों पर गहरी चिंता जताई। साथ ही उन्होंने सरकार को विस्तृत रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है।
उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि सरकार को रिपोर्ट में यह बताना होगा कि गांवों और अन्य इलाकों में नाबालिग लड़के-लड़कियों को जागरूक करने के लिए कौन-कौन से कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। क्या इसके लिए उन्हें एजुकेट किया जा रहा है? उन्हें इस बारे में शिक्षा दी जा रही है? आखिर क्या प्रयास किए जा रहे हैं।
हाई कोर्ट ने आगे कहा कि उसके सामने आने वाले अधिकतर POCSO मामलों में पीड़ितों के लिए सपोर्ट पर्सन अपॉइंट नहीं होते हैं। कानून के अनुसार, ऐसे मामलों में पीड़ित की सहायता के लिए सपोर्ट पर्सन की नियुक्ति जरूरी है। कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि FIR दर्ज होने के बाद क्या यह प्रक्रिया अपनाई जाती है या नहीं।
चीफ जस्टिस रेवती प्रशांत मोहिते डेरे ने आगे ये भी कहा कि राज्य सरकार को यह भी बताना होगा कि मेघालय राज्य के सभी पुलिस स्टेशनों से कितने सपोर्ट पर्सन नियुक्त किए जाते हैं। इनकी संख्या कितनी है? पूरी डिटेल्स दें। साथ ही हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पीड़ितों को कानूनी सहायता मिलना उतना ही जरूरी है, जितना अपराध की जांच और सुनवाई के दौरान।
दरअसल, ये पूरा मामला एक POCSO केस में सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के सामने आया। ‘द इंडियन एक्प्रेस’ के रिपोर्ट के मुताबिक, घटना के समय सर्वाइवर नाबालिग थी, लेकिन अब वह 20 साल की बालिग हो चुकी है। वह आरोपी के बच्चे की मां भी है। सर्वाइवर फिलहाल अपने मायके में रह रही है और उसने कोर्ट में कहा कि वह आरोपी के साथ रहना चाहती है।
वहीं इस पूरे मामले पर पुलिस का कहना था कि दोनों रिश्तेदार हैं। इसलिए दोनों साथ नहीं रह रहे थे, लेकिन आरोपी के वकील ने बताया कि इसकी असली वजह ट्रायल कोर्ट की जमानत शर्तें थीं। कोर्ट ने आरोपी को सर्वाइवर से 100 मीटर दूर रहने का आदेश दिया था।
अब इस मामले में सर्वाइवर और मूल शिकायतकर्ता दोनों (Original Complainant) ने आरोपी के खिलाफ कार्रवाई रद्द करने का मांग की। वकील का कहना है कि अब उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। हाई कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी की रिपोर्ट में बताया गया कि दोनों का लगभग ढाई साल का बच्चा है और दोनों परिवार भी उनके साथ रहने पर सहमत हैं। आरोपी ने सर्वाइवर और बच्चे की जिम्मेदारी लेने की इच्छा जताई, जबकि सर्वाइवर ने भी उसके साथ रहने की बात कही है।