पश्चिम बंगाल की राजनीति के “चाणक्य” कहे जाने वाले Mukul Roy का 71 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। TMC के संस्थापक सदस्य रहे रॉय ने BJP में भी अहम भूमिका निभाई और अपनी रणनीति से राज्य की राजनीति की दिशा बदल दी।
West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी के प्रमुख चेहरों में शुमार रहे पूर्व रेल मंत्री मुकुल रॉय (Mukul Roy) का रविवार को निधन हो गया। वे 71 साल के थे। मुकुल रॉय को टीएमसी ही नहीं, बीजेपी भी हमेशा याद रखेगी। दरअसल, वे टीएमसी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे, लेकिन बाद में फिर ममता की पार्टी में शामिल हुए। मुकुल रॉय को बंगाल की राजनीति का चाणक्य कहा जाता था।
मुकुल रॉय को लेकर एक किस्सा हमेशा चर्चाओं में रहा है। वह तब का है जब उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बात को नहीं माना था। इसके बाद इसको लेकर उन्होंने मीडिया में भी बयान दिया था।
मनमोहन सिंह की दूसरी सरकार में मुकुल रॉय को पहले जहाजरानी राज्यमंत्री बनाया गया था। वहीं बंगाल की सीएम बनने के बाद ममता बनर्जी को रेल मंत्रालय छोड़ना पड़ा। इसके बाद मुकुल रॉय को रेल राज्यमंत्री की जिम्मेदारी दी गई थी। वहीं ममता के इस्तीफे के बाद मनमोहन ने कुछ समय के लिए रेल मंत्रालय अपने पास रखा था।
11 जुलाई 2011 को असम में गुवाहाटी-पुरी एक्सप्रेस पर एक हादसा हुआ था। पीएम मनमोहन सिंह ने मुकुल रॉय को घटनास्थल पर जाने का निर्देश दिया था। लेकिन वे नहीं गए। इसके बाद मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि वे तीन राज्यमंत्रियों में से एक हैं और प्रधानमंत्री ही रेल मंत्री भी हैं। उन्होंने बताया कि वे हावड़ा में लाए जा रहे घायलों और उनके परिजनों से मुलाकात कर रहे हैं।
हालांकि मुकुल रॉय के इस रवैये को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हुआ और अगले कैबिनेट फेरबदल में मुकुल रॉय को रेल मंत्रालय से हटा दिया गया। उस समय चर्चा थी कि ममता बनर्जी के बाद उन्हें रेल मंत्री बनाया जा सकता है, लेकिन निर्देश का पालन न होने के कारण टीएमसी कोटे से दिनेश त्रिवेदी को रेल मंत्री नियुक्त किया गया।
हालांकि 2012 के रेल बजट में किराया बढ़ोतरी के बाद ममता बनर्जी ने दिनेश त्रिवेदी से इस्तीफा मांग लिया। इसके तुरंत बाद मुकुल रॉय को रेल मंत्री बनाया गया और उन्होंने किराया बढ़ोतरी वापस ले ली। इस फैसले पर काफी हंगामा हुआ, लेकिन गठबंधन सरकार होने के कारण मामला आगे नहीं बढ़ा। बाद में सितंबर 2012 में ममता बनर्जी द्वारा यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने पर मुकुल रॉय ने भी मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
TMC और भाजपा-दोनों में काम करते हुए बंगाल की राजनीति पर गहरी छाप छोड़ने वाले रॉय को एक बेहतरीन रणनीतिकार माना जाता था। उन्हें प्रदेश की राजनीति के चाणक्य के नाम से भी जाना जाता था। उन्होंने भाजपा को राज्य में मजबूत होने में बड़ी भूमिका निभाई। लेकिन जीवन के आखिरी वर्षों में उनका वही तेज दिमाग कमजोर पड़ गया, जिसने उन्हें ऊंचाइयों तक पहुंचाया था। कभी राज्य के हर कोने की जानकारी रखने वाले रॉय को अंतिम समय में लोगों के नाम तक याद रखने में मुश्किल होने लगी थी।
जब ममता बनर्जी ने 1 जनवरी 1998 को कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई, तो मुकुल रॉय शुरू से ही उनके साथ थे और पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल थे। उस समय पश्चिम बंगाल में लंबे समय से वामपंथी दल सत्ता में था, और टीएमसी जल्दी ही उसका मुख्य प्रतिद्वंद्वी बन गई।
मुकुल रॉय ने बूथ-बूथ और मोहल्ले-मोहल्ले जाकर पार्टी संगठन को मजबूत किया। उन्हें लोगों के नाम और चेहरे याद रखने में महारत थी—कहा जाता है कि वे लगभग हर कार्यकर्ता को नाम से जानते थे। वे जनसभाओं वाले बड़े नेता नहीं थे, लेकिन संगठन पर उनकी पकड़ बहुत मजबूत थी। इसी वजह से ममता बनर्जी के बाद उन्हें पार्टी का दूसरा सबसे ताकतवर नेता माना जाता था।
2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में भाजपा के अब तक के सबसे अच्छे प्रदर्शन के पीछे मुकुल रॉय की बड़ी भूमिका मानी जाती है। उस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने राज्य की 42 में से 18 सीटें जीतीं, जिससे बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला और भाजपा के सत्ता में आने की चर्चा तेज हो गई।
2021 के विधानसभा चुनाव से पहले भी मुकुल रॉय ने भाजपा को सलाह दी कि टीएमसी के नाराज नेताओं को अपने साथ जोड़ा जाए। इसी दौरान सुवेंदु अधिकारी, राजीव बनर्जी और जितेंद्र तिवारी जैसे नेता भाजपा में शामिल हो गए। टीएमसी की वरिष्ठ नेता और चार बार की विधायक सोनाली गुहा, जो ममता बनर्जी की करीबी मानी जाती हैं, उन्होंने भी सार्वजनिक रूप से कहा कि वे “मुकुल दा” के कहने पर भाजपा में गई थीं।