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Crime Files: कैसे हुए थी मुंबई से पाकिस्तान पहुंचे 19 आतंकियों की ट्रेनिंग, Inside Story

1993 Mumbai Serial Blasts में शामिल आतंकियों के ट्रेनिंग के लिए पाकिस्तान जाने से लौटने तक की कहानी।

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Mar 19, 2026
1993 मुंबई ब्लास्ट के लिए आतंकियों को तैयार करने का काम पाकिस्तान में दो 'बाबाजी' ने किया था। यह तस्वीर एआई के जरिये बनी है।

Mumbai Serial Blasts के 33 साल हो चुके हैं। 1993 में मार्च (13 तारीख) का ही महीना था जब आतंकियों ने मुंबई को दहला दिया था। दो घंटे के भीतर करीब दर्जन भर धमाके किए थे। एक धमाके की सूचना पाकर पुलिस निकल ही रही होती थी कि दूसरे ब्लास्ट की खबर आ जाती थी। इन धमाकों में 250 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और 1400 से ज्यादा जख्मी हुए थे।

ऐसा आतंकी हमला देश ने पहली बार देखा था। इसके लिए आतंकी पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेकर आए थे और इसका पूरा इंतजाम अंडरवर्ल्ड डॉन टाइगर मेमन ने किया था। यह ट्रेनिंग कैसे हुई थी इसका पूरा ब्योरा एस. हुसैन जैदी ने अपनी किताब 'ब्लैक फ्राइडे - द ट्रू स्टोरी ऑफ बॉम्बे बम ब्लास्ट्स' में दिया है। जैदी ने चार्जशीट, आरोपियों के बयान और अन्य दस्तावेज के आधार पर यह किताब लिखी है। आरोपी बादशाह खान के हवाले से पाकिस्तान में आतंकियों की ट्रेनिंग का जो ब्योरा दिया गया है, उसे आगे पढ़िए।

बादशाह खान ने पहली ही मुलाक़ात में टाइगर मेमन पर छोड़ी छाप

बादशाह खान ने अंडरवर्ल्ड डॉन टाइगर मेमन पर पहली ही मुलाक़ात में अपनी छाप छोड़ दी थी। इसी मुलाक़ात में टाइगर ने उसे पहली बार हाथ में एके-56 और हैंड ग्रेनेड थमाया था। दरअसल यह मुलाक़ात ही इन हथियारों की खेप उतरवाने और ठिकाने तक पहुंचाने के सिलसिले में हुई थी।

13 मार्च, 1993 को लगातार कई विस्फोट करवा कर मुंबई को दहलाने के लिए टाइगर ने जो टीम चुनी, उसमें भी बादशाह को रखा गया था। इन धमाकों को अंजाम दिलवाने के लिए उसने अपनी टीम को ट्रेनिंग के लिए दुबई के रास्ते पाकिस्तान भेजा था। 13, 15, 17 और 19 फरवरी को अलग-अलग बैच में कुल 19 गुर्गों को पाकिस्तान भेजा गया था। ये ट्रेनिंग लेकर 4 मार्च को मुंबई लौट आए थे।

बादशाह पाकिस्तान भेजी गई सात गुर्गों की पहली ही टीम में था। यह टीम 11 फरवरी को मुंबई से दुबई और 13 को वहां से पाकिस्तान रवाना हुई थी। उस समय दुबई में जो भी भारतीय डॉन थे, उन सबने बिना वीजा पाकिस्तान जाने का इंतजाम बना रखा था। इस व्यवस्था को वे अपनी भाषा में 'खांचा' कहा करते थे।

बिना वीजा पहुंच गया पाकिस्तान, वहां तैयार था मेजबान

टाइगर मेमन और अयूब मेमन ने बादशाह और उसके छह साथियों को विमान का बोर्डिंग पास देकर दुबई से रवाना कर दिया। चिकना को पास के अलावा एक सफ़ेद टोपी भी दी गई। इस्लामाबाद में विमान से उतरते ही सभी घबराए हुए थे कि बिना वीजा के कैसे बाहर निकलेंगे। तभी जावेद चिकना ने टाइगर के कहे मुताबिक वह सफ़ेद टोपी पहन ली और एक अखबार रख लिया। कुछ ही पल में एक आदमी उसके पास आया और पूछा- आप लोग टाइगर के दोस्त हैं?

चिकना के हां में सिर हिलाते ही उसने अपना परिचय (जफर भाई) दिया और सबसे गर्मजोशी से हाथ मिलाया। इसके बाद वह सबको आराम से हवाईअड्डे से बाहर निकाल ले गया। किसी ने टोका तक नहीं। उल्टा, पुलिस और कस्टम के अधिकारियों ने उसे सलाम ठोंका।

हवाईअड्डे के बाहर उन्हें ले जाने के लिए जीप खड़ी थी। जीप उन्हें लेकर एक आलीशान बंगले में गई। वहां सबके रहने-खाने का शानदार इंतजाम था। खाने के बाद सबके पासपोर्ट और टिकट रखवा लिए गए और सभी को एक-एक फर्जी नाम दे दिया गया। पाकिस्तान में रहते हुए किसी को अपना या दूसरे का असली नाम बोलने की इजाजत नहीं थी।

ट्रेनिंग देने वाले 'बाबाजी'

14 फरवरी को सुबह-सुबह जफर बंगले पर हाजिर हो गया। नाश्ते के बाद वह सभी को शहर घुमाने ले गया। शाम को सबको ट्रेनिंग कैंप ले जाया गया। कैंप शहर से दूर, घने जंगल और पहाड़ों के बीच था। अंधेरा हो चुका था। जीप करीब ढाई घंटे चल चुकी थी। लगभग 150 किलोमीटर का सफर तय हो चुका था। आगे पैदल चलने के लिए कहा गया। जंगल-झाड़ी के बीच करीब आधा घंटा चलने के बाद सब एक ऐसी जगह पहुंचे जहां पहाड़ियों के बीच खाली जगह दिख रही थी। उसके एक तरफ बड़े-बड़े तंबू लगे हुए थे। वहां खौफनाक-से दिखने वाले दो लंबे-मुस्टंडे लोग मौजूद थे। कड़ाके की सर्दी में जहां बादशाह और उसके साथी स्वेटर-जैकेट पहनने के बावजूद कांप रहे थे, वहीं वे दोनों केवल कुर्ते में ही सामान्य थे। जफर ने उन्हें 'बाबाजी' कह कर बुलाया और बताया कि वे दोनों ही सबको ट्रेनिंग देंगे।

कैंप में इन दोनों के अलावा चार लोग और थे। इनमें से दो खाना-बर्तन और साफ-सफाई आदि के लिए थे। बाकी दो सुरक्षा के लिए थे। खाना रोज तय वक्त पर कहीं से आ जाता था। नाश्ता टेंट में होता था।

ट्रेनिंग शुरू, तीसरे दिन एके-56 पर हाथ साफ कराया

15 फरवरी की सुबह से ट्रेनिंग शुरू हो गई। पहले दिन तो जॉगिंग और तमाम दूसरे व्यायाम करवाए गए। तीन घंटे खूब मेहनत करवाई गई।

17 फरवरी को जब टेंट में सब नाश्ता करने जुटे तो वहां ट्रेनर भी थे। एक ट्रेनर के पास एके-56 था। उसने कहा- अब तुम्हें मौत का सामान चलाना सिखाया जाएगा। नाश्ते के बाद सभी मैदान में वापस आए तो उन्हें ऑटोमैटिक पिस्टल, हैंड गन, लाइट मशीनगन और कलाश्निकोव्स दिखाए गए। उन्हें इन हथियारों को पकड़ना और चलाना सिखाया गया। इसके बाद दो दिन तक केवल एक काम कराया गया। अचूक निशाना लगाने की ट्रेनिंग दी गई। एक साथ दस मशीनगनें चलती थीं तो पूरा इलाका गोलियों की आवाज से गूंज जाता था।

जमीन पर बड़ी सी चादर बिछी थी और ट्रेनर समझा रहे थे कि एके-56 को कैसे खाली करना और फिर उसमें गोलियां भरना है। पहले उन्होंने खुद करके दिखाया, बाद में लड़कों से करके दिखाने के लिए कहा। इसके बाद लाइट मशीनगन के साथ यही प्रक्रिया दोहराई गई। फिर माउजर पिस्टल और राइफल से प्रैक्टिस करवाई गई।

जायजा लेने आया टाइगर मेमन

19 फरवरी को नौ और लड़के ट्रेनिंग के लिए आ गए थे। अगले दिन खुद टाइगर मेमन भी कैंप पहुंच गया था। उसने खुद परख कर देखा कि उसके गुर्गों ने क्या कुछ सीखा है। उसने उनसे हथगोले फिंकवा कर देखा। उन्हें दो तरह के हथगोले चलाने की ट्रेनिंग दी गई थी। बाकायदा बोर्ड पर डायग्राम बना कर समझाया जाता था।

'बाबाजी' ने पेंसिल टाइमर के बारे में भी समझाया और बताया कि साधारण पेंसिल की तरह दिखने वाली यह चीज डेटोनेटर है। लाल पेंसिल एक्टिवेट करने के 15 मिनट बाद धमाका करती है, जबकि सफ़ेद एक घंटा और हरी ढाई घंटे बाद।
20 फरवरी को लंच के बाद एक नए हथियार के बारे में बताया गया। यह काले रंग की साबुन जैसी दिखने वाली टिकिया थी। 'बाबाजी' ने बताया- यह आरडीएक्स है। इसकी खोज दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुई थी। यह खतरनाक बम बनाने के लिए सबसे कारगर चीज है।

जब ट्रेनर ने दिखाया आरडीएक्स से धमाके का नमूना

फिर ट्रेनर ने लड़कों को आरडीएक्स बम बनाना सिखाया। उसने बम के साथ 30 मिनट बाद फटने वाला एक पेंसिल टाइमर जोड़ दिया। अचानक एक भयानक धमाके से विशाल जंगल का वह पूरा इलाका दहल गया। धमाका इतना जोरदार था कि आसमान से पत्थर, मिट्टी-कीचड़ बरसने लगे और नीचे धरती हिलने लगी। पूरे इलाके में आसमान काला हो गया था। धुआं ही धुआं दिख रहा था। दस मिनट तक तो कोई कुछ नहीं देख-सुन पा रहा था। जिस जगह बम रखा गया था, वहां देखा तो कई फीट गहरा गड्ढा बन गया था। इसके बाद 'बाबाजी' ने लड़कों से कई बम बनवाए और उनसे धमाके करवा कर टेस्ट किया।

रॉकेट लॉंचर छूने में भी लग रहा था डर

21 फरवरी को रॉकेट लॉंचर लाया गया। यह दिखने में ही इतना खतरनाक था कि लड़के छूने में भी डर रहे थे। ट्रेनर ने इसकी एक-एक बारीकी समझाते हुए बताया कि इसे कैसे चलाया जाता है और यह काम कैसे करता है। हालांकि, इसका प्रैक्टिकल करके नहीं बताया-दिखाया गया।

ट्रेनिंग हुई पूरी

21 फरवरी को टाइगर मेमन वापस चला गया। वह अपने साथ चार लड़कों को भी ले गया। बच गए लड़कों में से तीन (जावेद, अनवर, बादशाह खान) का नाम लेकर टाइगर ने कहा कि अच्छी तरह सीख लो, आगे मुंबई में यह ट्रेनिंग काम आएगी। तब तक ट्रेनिंग में सिखाने का काम लगभग पूरा हो गया था। इसके बाद कुछ दिनों तक लड़कों से सिर्फ प्रैक्टिस कारवाई गई।

एक मार्च तक लड़कों की ट्रेनिंग पूरी हो गए थी। 2 मार्च को सभी 15 लड़कों को वापस उसी बंगले पर लाया गया, जहां इस्लामाबाद आने पर पहली रात रुकवाया गया था। जफर भाई एक बार फिर सबको इस्लामाबाद घुमाने ले गए। बाद में सभी को हवाईअड्डे ले जाकर बिना किसी सुरक्षा जांच या औपचारिकता के दुबई जाने वाले विमान में बिठवा दिया गया।

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