सुप्रीम कोर्ट में केरल के सबरीमला मंदिर मामले में दाखिल रिव्यू पिटीशन पर सुनवाई हुई। सबरीमला मंदिर मामले पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी की है।
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में बुधवार को केरल के सबरीमला मंदिर मामले (Sabarimala Temple Case) में दाखिल रिव्यू पिटीशन पर सुनवाई हुई। इस मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समाज कल्याण का इस्तेमाल धर्म को खोखला करने के लिए नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही कोर्ट ने माना कि लाखों लोगों की मान्यताओं को गलत या त्रुटिपूर्ण घोषित करना कोर्ट के लिए सबसे मुश्किल कामों में से एक होगा।
केरल के सबरीमला मंदिर मामले में दाखिल रिव्यू पिटीशन पर सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच सुनवाई कर रही है। इस पीठ में CJI सूर्यकांत, जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं। सबरीमला मंदिर समेत धार्मिक जगहों पर महिलाओं के साथ भेदभाव, कई धर्मों में धार्मिक आजादी के दायरे और इससे जुड़ी याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है।
सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने त्रावणकोर देवस्वओम बोर्ड (TDB) की तरफ से पक्ष रखा। कोर्ट में TDB ने आवश्यक धार्मिक प्रथाओं के सिद्धांत को जारी रखने का विरोध किया है। अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलों पर कोर्ट ने विचार किया। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा- अदालत के लिए सबसे कठिन काम यह हो सकता है कि वह करोड़ों लोगों की आस्था को गलत घोषित करे। इसके साथ ही अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या धार्मिक आस्था और प्रथाओं से जुड़े मामलों में गैर-विश्वासियों द्वारा दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई होनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने धार्मिक मामलों में अत्यधिक न्यायिक हस्तक्षेप के खिलाफ चेतावनी देते हुए कहा कि सामाजिक कल्याण सुधार के नाम पर हम धर्म को खोखला नहीं कर सकते हैं। सिंगवी ने कोर्ट से आवश्यक धार्मिक प्रथाओं के परीक्षण को खत्म करने की मांग की।
सिंघवी ने तर्क दिया कि यह सिद्धांत न्यायाधीशों को यह तय करने का अधिकार देता है कि किसी धर्म का कौन-सा हिस्सा आवश्यक है और कौन-सा नहीं, जो उचित नहीं है। अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि जैसे ही आवश्यक या अभिन्न शब्दों का उपयोग किया जाता है, अदालतें धर्म की परिभाषा तय करने लगती हैं, जो न्यायिक अतिक्रमण है। सिंघवी ने यह भी कहा कि धार्मिक मान्यताओं का मूल्यांकन उसी समुदाय के नजरिए से होना चाहिए, जो उन्हें मानता है, न कि बाहरी या न्यायिक मानकों से।
सिघंवी ने आगे कहा कि यदि कोई प्रथा ईमानदारी और सच्चे विश्वास के साथ धर्म का हिस्सा मानी जाती है तो उसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण मिलना चाहिए, बशर्ते वह सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य मौलिक अधिकारों के खिलाफ न हो। हालांकि, उन्होंने माना कि अदालतें अत्यधिक मामलों में हस्तक्षेप कर सकती हैं, जैसे जब कोई प्रथा जीवन या सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बनती हो। लेकिन धार्मिक मामलों में पीआईएल स्वीकार करने के लिए मानदंड अन्य मामलों की तुलना में अधिक सख्त होने चाहिए।
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