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भारत में महिलाओं का ऊंचा स्थान, उन्हें पश्चिम दृष्टिकोण से देखना ठीक नहीं : केंद्र सरकार

सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय संविधान बेंच ने सबरीमला में खास उम्र की महिलाओं के प्रवेश संबंधी मामले में समीक्षा याचिकाओं पर सुनवाई की। इस दौरान केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने महिलाओं के अधिकारों के बारे में अहम टिप्पणी की।

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भारत

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Vinay Shakya

Apr 08, 2026

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बच्ची से दुष्कर्म के मामले में सुप्रीम कोर्ट का सख्त आदेश

सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय संविधान बेंच ने सबरीमला में खास उम्र की महिलाओं के प्रवेश संबंधी मामले में समीक्षा याचिकाओं के साथ महिला अधिकारों और सदियों पुरानी धार्मिक व सामाजिक मान्यताओं के बीच होने वाले विवादों के निपटारे के लिए मंगलवार से ऐतिहासिक सुनवाई शुरू की। इन विवादों पर भी कोर्ट में अर्जियां व जनहित याचिकाएं दायर की गई हैं। ऐसे में इस बेंच का फैसला मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में 'महिला खतना' प्रथा और गैर-पारसी पुरुषों से शादी करने वाली पारसी महिलाओं के 'अगियारी' (अग्नि मंदिर) में प्रवेश की अनुमति देने जैसे मामलों पर आगे अदालती विवादों की राह तय करेगा।

भारत में महिलाओं का ऊंचा स्थान

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के पहले दिन केंद्र सरकार ने हलफनामा पेश करके एवं मौखिक तरीके से से संविधान बेंच में कहा कि सबरीमला मामला महिलाओं को प्रवेश से रोकने का नहीं, बल्कि वहां की धार्मिक परंपराओं से जुड़ा है। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने समीक्षा याचिकाओं का समर्थन करते हुए कहा कि भारतीय समाज में महिलाओं को बराबरी का नहीं, बल्कि ऊंचा दर्जा हासिल रहा है। इसे लिंग भेद या पितृ सत्तात्मक जैसे पश्चिमी देशों के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।

सबरीमला केस को लिंग भेद तरीके से देखा गया

कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने कहा कि सबरीमला मामले में 2018 के फैसले में इसे लिंग भेद के रूप में देखा गया, जो गलत है। पश्चिमी दृष्टिकोण की वजह से अक्सर समस्याएं पैदा हो रही हैं। भारतीय समाज महिलाओं की पूजा करता है। भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज, हम सभी हमारी देवियों के सामने सिर झुकाते हैं। खुली अदालत में एसजी ने जजों से तर्क वितर्क किए और कहा कि अय्यप्पा स्वामी के सभी मंदिर सबके लिए खुले हैं।


केवल सबरीमला में कोई परंपरा है तो इसे लिंग भेद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म में कई उपसंप्रदाय हैं जिनकी अपनी आस्था व परंपराएं हैं। 'धार्मिक संप्रदाय' क्या है या कौन सी धार्मिक प्रथाएं 'आवश्यक' हैं, इसकी एक संकीर्ण परिभाषा हिंदू धर्म की अंतर्निहित बहुलता को संकुचित कर देगी। अदालतें इसका निर्णय नहीं कर सकतीं। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2018 में दिए फैसले में सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दे दी थी। इसके खिलाफ बड़ी संख्या में समीक्षा याचिकाएं दायर की गईं तो यह मामला सुनवाई के लिए पहले पांच, फिर सात और अंतत: नौ जजों की बेंच को सौंप दिया गया।

अजमेर दरगाह, गुरुद्वारों में भी सिर ढकते हैं

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने कहा कि कुछ पूजा विधियां अलग हो सकती हैं, हमें इनका सम्मान करना चाहिए। सभी कुछ मानव गरिमा या व्यक्तिगत शारीरिक स्वतंत्रता से संबंधित नहीं हो सकता है। अगर मैं गुरुद्वारा जाना चाहूं, मुझे अपना सिर ढकना होगा। मैं यह नहीं कह सकता कि मेरी गरिमा और आजादी कहां है? यह किसी की स्वायत्तता छीनने जैसा नहीं है। यह धर्म की बुनियादी मान्यताओं, आस्था और विश्वास का सम्मान करना है। जब हम अजमेर दरगाह जाते हैं, हम अपने सिर ढकते हैं। कोई यह नहीं कहता कि यह मेरी शारीरिक स्वतंत्रता नहीं है।

कोर्ट की बेंच में हर धर्म के जज, महिला न्यायाधीश भी

CJI सूर्यकांत की ओर से गठित 9 जजों की बेंच में सभी धर्मों के जजों और एक महिला जज को शामिल किया गया। इसमें जस्टिस बीवी नागरत्ना (सुप्रीम कोर्ट की एकमात्र महिला जज जो अगले साल पहली महिला CJI बनेंगी), जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह (मुस्लिम), जस्टिस एजी मसीह (ईसाई), जस्टिस पीबी वराले (दलित और गजल प्रेमी), जस्टिस आर. महादेवन, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस अरविंद कुमार शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की दलीलें

  • कोर्ट में केंद्र सरकार की तरफ से कहा गया कि अगर एक खास धार्मिक समुदाय अपने एक खास मंदिर या धार्मिक स्थान में समाज के एक वर्ग (जैसे विशेष आयु वर्ग की महिलाओं) का प्रवेश नियंत्रित करना चाहता है तो अदालत को यह मामला धार्मिक विविधता और समुदाय के धार्मिक अधिकारों की रक्षा की नजर से देखना चाहिए।
  • यदि एक धार्मिक समुदाय समाज के एक पूरे वर्ग (जैसे सभी महिलाओं) के अपने सभी धार्मिक स्थानों में प्रवेश पर प्रतिबंध लगाए, जिससे लोगों की धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार ही पूरी तरह खत्म हो जाए तो अदालत को ऐसे मामले को धार्मिक समुदाय के अधिकारों के विपरीत नागरिक अधिकारों की नजर से देखना चाहिए।
  • संविधान ने किसी धर्म, उसके किसी वर्ग या मान्यताओं से जुड़े सामाजिक सुधार व कल्याण के लिए कानून बनाने का काम विधायिका को सौंपा है। इस मामले में न्यायिक पुनरीक्षण सीमित है। अगर किसी धर्म या धार्मिक परंपरा में सुधार की जरूरत है, तो यह धर्म या समाज के भीतर से होना चाहिए। इसे किसी न्यायिक निर्णय से थोपा नहीं जा सकता। क्या कोर्ट किसी धर्म को सुधार सकती है?
  • सबरीमाला पर पूर्व आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने भगवान अय्यप्पा के भक्तों को एक वर्ग की परिभाषा में शामिल नहीं माना, जो गलत था। मौजूदा इस मामले में जो फैसला होगा, अगले कम से कम 30-40 साल देश उसी से चलेगा। भारत में धर्मों का दायरा विशाल है। हिंदू धर्म में उप् संप्रदाय हैं, स्वतंत्र पहचान रखते हैं। इस्लाम में भी आंतरिक विविधता है। कोर्ट को इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए। मैं चार्वाक दर्शन को मानने के बावजूद हिंदू हो सकता हूं। नास्तिक व मूर्ति पूजा न मानने वाले भी हिंदू हो सकते हैं। शिरडी और निजामुद्दीन औलिया दरगाह में भी हिंदू जाते हैं, इस विविधता का कोर्ट को ध्यान रखना होगा।

सुप्रीम कोर्ट में हुई तीखी बहस

  • सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता: कौन तय करेगा कि कोई चीज अंधविश्वास है या आवश्यक धार्मिक प्रथा? अदालतें यह फैसला नहीं कर सकतीं।
  • जस्टिस अमानुल्लाह: क्या एक निश्चित बिंदु पर अदालतों को धार्मिक प्रथा की अनिवार्यता की जांच में नहीं पड़ना चाहिए?
  • सॉलिसिटर मेहता: धार्मिक प्रथा की अनिवार्यता न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आ सकती।
  • जस्टिस सुंदरेश: क्या न्यायालय विशेषज्ञ की भूमिका नहीं निभा सकता?
  • जस्टिस बागची: क्या अदालतें दीवानी मुकदमों में धार्मिक प्रथाओं की अनिवार्यता का फैसला नहीं कर सकतीं?
  • सॉलिसिटर मेहता: यदि कोई व्यक्ति नरभक्षण को अपने धर्म का हिस्सा बताता है, तो अदालतों को हस्तक्षेप करने में संकोच नहीं करना चाहिए, यह अनैतिक है। इसके लिए अदालतों को किसी धार्मिक अध्ययन की आवश्यकता नहीं है।
  • जस्टिस नागरत्ना: सबरीमला के संदर्भ में अस्पृश्यता का तर्क कैसे दिया जा सकता है? एक महिला तीन दिन अछूत और चौथे दिन बिना अछूत कैसे हो सकती है? एक महिला होने के नाते कह सकती हूं कि अनुच्छेद 17 के तहत यह कैसे ठीक है?
  • सॉलिसिटर मेहता: 2018 के फैसले में न्यायिक राय में से एक में कहा गया था कि महिलाओं को अछूत के रूप में माना जाता था। हम इससे असहमत हैं, यह मासिक धर्म का नहीं बल्कि खास उम्र की महिलाओं को प्रवेश निषिद्ध है। भारत उतना पितृसत्तात्मक या लिंग-विशिष्ट नहीं है जितना पश्चिम समझता है। इसे पश्चिम दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।
  • जस्टिस नागरत्ना: किसी सामाजिक बुराई को धार्मिक प्रथा का नाम दिया जाता है, तो अदालत निश्चित रूप से दोनों के बीच अंतर कर सकती है।
  • सॉलिसिटर मेहता: इसका जवाब अनुच्छेद 25(2)(बी) में मिल सकता है। यानी, सामाजिक सुधार के लिए कानून बनाना विधायिका का काम है।