
सुप्रीम कोर्ट (File Photo)
सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय संविधान बेंच ने सबरीमला में खास उम्र की महिलाओं के प्रवेश संबंधी मामले में समीक्षा याचिकाओं के साथ महिला अधिकारों और सदियों पुरानी धार्मिक व सामाजिक मान्यताओं के बीच होने वाले विवादों के निपटारे के लिए मंगलवार से ऐतिहासिक सुनवाई शुरू की। इन विवादों पर भी कोर्ट में अर्जियां व जनहित याचिकाएं दायर की गई हैं। ऐसे में इस बेंच का फैसला मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में 'महिला खतना' प्रथा और गैर-पारसी पुरुषों से शादी करने वाली पारसी महिलाओं के 'अगियारी' (अग्नि मंदिर) में प्रवेश की अनुमति देने जैसे मामलों पर आगे अदालती विवादों की राह तय करेगा।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के पहले दिन केंद्र सरकार ने हलफनामा पेश करके एवं मौखिक तरीके से से संविधान बेंच में कहा कि सबरीमला मामला महिलाओं को प्रवेश से रोकने का नहीं, बल्कि वहां की धार्मिक परंपराओं से जुड़ा है। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने समीक्षा याचिकाओं का समर्थन करते हुए कहा कि भारतीय समाज में महिलाओं को बराबरी का नहीं, बल्कि ऊंचा दर्जा हासिल रहा है। इसे लिंग भेद या पितृ सत्तात्मक जैसे पश्चिमी देशों के दृष्टिकोण से नहीं देखा जाना चाहिए।
कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने कहा कि सबरीमला मामले में 2018 के फैसले में इसे लिंग भेद के रूप में देखा गया, जो गलत है। पश्चिमी दृष्टिकोण की वजह से अक्सर समस्याएं पैदा हो रही हैं। भारतीय समाज महिलाओं की पूजा करता है। भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री से लेकर सुप्रीम कोर्ट के जज, हम सभी हमारी देवियों के सामने सिर झुकाते हैं। खुली अदालत में एसजी ने जजों से तर्क वितर्क किए और कहा कि अय्यप्पा स्वामी के सभी मंदिर सबके लिए खुले हैं।
केवल सबरीमला में कोई परंपरा है तो इसे लिंग भेद के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म में कई उपसंप्रदाय हैं जिनकी अपनी आस्था व परंपराएं हैं। 'धार्मिक संप्रदाय' क्या है या कौन सी धार्मिक प्रथाएं 'आवश्यक' हैं, इसकी एक संकीर्ण परिभाषा हिंदू धर्म की अंतर्निहित बहुलता को संकुचित कर देगी। अदालतें इसका निर्णय नहीं कर सकतीं। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2018 में दिए फैसले में सबरीमला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दे दी थी। इसके खिलाफ बड़ी संख्या में समीक्षा याचिकाएं दायर की गईं तो यह मामला सुनवाई के लिए पहले पांच, फिर सात और अंतत: नौ जजों की बेंच को सौंप दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने कहा कि कुछ पूजा विधियां अलग हो सकती हैं, हमें इनका सम्मान करना चाहिए। सभी कुछ मानव गरिमा या व्यक्तिगत शारीरिक स्वतंत्रता से संबंधित नहीं हो सकता है। अगर मैं गुरुद्वारा जाना चाहूं, मुझे अपना सिर ढकना होगा। मैं यह नहीं कह सकता कि मेरी गरिमा और आजादी कहां है? यह किसी की स्वायत्तता छीनने जैसा नहीं है। यह धर्म की बुनियादी मान्यताओं, आस्था और विश्वास का सम्मान करना है। जब हम अजमेर दरगाह जाते हैं, हम अपने सिर ढकते हैं। कोई यह नहीं कहता कि यह मेरी शारीरिक स्वतंत्रता नहीं है।
CJI सूर्यकांत की ओर से गठित 9 जजों की बेंच में सभी धर्मों के जजों और एक महिला जज को शामिल किया गया। इसमें जस्टिस बीवी नागरत्ना (सुप्रीम कोर्ट की एकमात्र महिला जज जो अगले साल पहली महिला CJI बनेंगी), जस्टिस एमएम सुंदरेश, जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह (मुस्लिम), जस्टिस एजी मसीह (ईसाई), जस्टिस पीबी वराले (दलित और गजल प्रेमी), जस्टिस आर. महादेवन, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस अरविंद कुमार शामिल हैं।
Updated on:
08 Apr 2026 12:22 am
Published on:
08 Apr 2026 12:07 am
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