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Nitish Kumar Oath: नीतीश कुमार के शपथ के साथ क्यों याद आ रहे एक वोट से अटल सरकार गिराने वाले गिरिधर गोमांग?

नीतीश कुमार राज्य सभा सांसद बन गए हैं। लेकिन उनके शपथ के साथ एक वोट से वाजपेयी सरकार गिरवाने वाले गिरधर गोमंग क्यों याद आ रहे हैं? पढ़िए कहानी:

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Apr 10, 2026
पीएम नरेंद्र मोदी के साथ नीतीश कुमार (फ़ाइल फोटो)

वह महीना अप्रैल का ही था। तारीख थी 17 और साल 1999। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार मात्र एक वोट (269-270) से गिर गई थी। इसके साथ ही एक सांसद का नाम इतिहास में दर्ज हो गया था। वह सांसद थे कांग्रेस के गिरिधर गोमांग।

गोमांग ओड़िशा के मुख्यमंत्री बन चुके थे, लेकिन उन्होंने सांसदी नहीं छोड़ी थी। मुख्यमंत्री रहते हुए वह वाजपेयी सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर मतदान करने आ गए थे और एक वोट से सरकार हार गई थी।

गोमांग का वह मतदान राजनीति में हमेशा चर्चा का विषय रहा। उनके इस कदम पर लगातार सवाल उठाए गए, लेकिन गोमांग का तर्क हमेशा यही रहा कि वह सांसद थे और उनकी पार्टी ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट जारी करने के लिए व्हिप जारी किया था। ऐसे में बतौर कांग्रेसी उन्हें पार्टी के आदेश का पालन करना ही था।

वैसे सरकार गिराने में जयललिता का भी बड़ा रोल था। एआईएडीएमके की जयललिता वाजपेयी सरकार के खिलाफ हो गई थीं और उन्होंने आखिरी पलों में एक दांव चल कर बसपा को सरकार के खिलाफ कर दिया था।

प्रमोद महाजन ने बड़ी जुगत से मायावती को सरकार का समर्थन करने के लिए राजी किया था। उन्हें और पूरी बीजेपी को उम्मीद थी कि बसपा विश्वास प्रस्ताव का समर्थन करेगी, लेकिन वह सदन में उठीं और कहा कि उनकी पार्टी सरकार के विश्वास प्रस्ताव का विरोध करती है।

मायावती की घोषणा से पूरा बीजेपी खेमा सन्न था, लेकिन यह हुआ कैसे? तो इस सबके पीछे जयललिता थीं। जयललिता ने अपनी दोस्त शशिकला के पति नटराजन की मदद ली और उन्हें कांशी राम के सेक्रेटेरी के पास भेजा। उनका सेक्रेटरी तमिलनाडु का ही था। नटराजन से उनकी दोस्ती भी थी। दोनों दोस्तों में बात बन गई और तय हुआ कि बसपा सरकार के खिलाफ वोट करेगी। यह अलग बात थी, कि दोबारा चुनाव हुए तो वाजपेयी ने और मजबूती के साथ सरकार में वापसी की।

(नीतीश के पहली बार सीएम बनने की कहानी पढ़ें)

वर्ष 2000 में राम विलास पासवान ने सीएम बनने का बीजेपी का जो ऑफर ठुकराया, नीतीश कुमार ने उसे मान लिया था।

लेकिन, गिरिधर गोमांग का किस्सा नीतीश के शपथ के साथ याद आने का क्या तुक है? वो इसलिए कि नीतीश ने भी मुख्यमंत्री का पद छोड़े बिना ही सांसद के रूप में शपथ ली है।

वैसे कहा जा रहा है कि नीतीश 15 अप्रैल को सीएम के पद से इस्तीफा दे सकते हैं। उधर, 16 अप्रैल को केंद्र सरकार सांसद का विशेष सत्र बुलवाने वाली है। इसमें संसदीय चुनावों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने का प्रावधान करने वाले कानून में संशोधन करवाए जाने का विचार है। वैसे इस पर वोटिंग में एक वोट से आर या पार होने जैसी स्थिति नहीं है, फिर भी यह देखने वाली बात होगी कि नीतीश कुमार इसमें शामिल होने के पहले सीएम पद छोड़ देते हैं या सीएम रहते हुए शामिल होते हैं।

इस बीच, बिहार में सत्ता परिवर्तन की कवायद भी चल रही है और नए सीएम को लेकर कयास भी लगाए जा रहे हैं। उप मुख्यमंत्री और भाजपा नेता सम्राट चौधरी का नाम अटकलों में सबसे ऊपर है।

नीतीश के सीएम पद छोड़ते ही बिहार से नीतीश युग का औपचारिक समापन हो जाएगा। नीतीश करीब 20 साल मुख्यमंत्री रहे और माना जा रहा है के वह अब अंतिम राजनीतिक पारी दिल्ली में खेलने आए हैं।

एक समय था जब नीतीश नरेंद्र मोदी के इतने खिलाफ थे कि उन्हें बिहार में चुनाव प्रचार करने नहीं आने दिया था, लेकिन आज उन्हीं मोदी के राज में बीजेपी ने नीतीश को बिहार के सीएम हाउस से बाहर कर दिया।

कभी नीतीश कुमार नहीं चाहते थे कि बिहार में चुनाव प्रचार के लिए नरेंद्र मोदी आएं। (फ़ाइल फोटो)
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