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गणतंत्र दिवस परेड से झांकियों का पुराना कनेक्शन, हर साल बना रहता है क्रेज

गणतंत्र दिवस परेड को लेकर लोगों में उत्साह रहता है। 26 जनवरी की सुबह से भी देशवासी टीवी पर दूरदर्शन लगाकर झांकियां देखने के लिए बैठ जाते हैं। इस बार भी देश के 77 वें गणतंत्र दिवस पर निकलने वाली परेड में फिर से झांकियों के जरिए भारत की ताकत को देखा जा सकेगा। पढ़ें पूरी खबर...

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Republic Day Jhanki

सोमवार को देस एक बार फिर कर्तव्यपथ पर गणतंत्र दिवस की परेड का साक्षी बनेगा। इस परेड में इस बार 17 झांकियां विभिन्न राज्यों की और 13 झांकियां अलग-अलग केंद्रीय शासित प्रदेशों, मंत्रालय और विभागों की अलग-अलग कुल 30 झांकियां दिखाई देंगी। गणतंत्र दिवस परेड के बारे में मशहूर कमेंटेटर जसदेव सिंह बताते थे कि गणतंत्र दिवस परेड के दौरान राजपथ ( अब कर्तव्यपथ) पर दर्शक झांकियों का हर्षध्वनि से स्वागत करते हैं। ये सिलसिला अब भी जारी है। जसदेव सिंह ने करीब आधी सदी तक रेडियो और टीवी पर गणतंत्र दिवस परेड का आंखों देखा हाल सुनाया था। इस बार भी देश के 77 वें गणतंत्र दिवस पर निकलने वाली परेड में फिर से झांकियों के जरिए भारत के बदलते चेहरे को देखा जा सकेगा।

गणतंत्र दिवस की सुबह जब कर्तव्य पथ पर सूरज निकलता है, तो मार्च करते जवान, मिलिट्री बैंड, डांस या कोई करतब दिखाते स्कूली बच्चे और फाइटर प्लेंस के फ्लाईपास्ट के बीच झांकिया लाखों-करोड़ों लोगों का अपनी तरफ ध्यान खींचती हैं। ये चलती-फिरती कलाकृतियां रंग, आवाज और प्रतीकों से भरी होती हैं। ये भारत की एकता में विविधता की कहानी बयान करती हैं।

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दो साल देर से शुरू हुईं थीं झांकियां

गणतंत्र दिवस की परेड 1950 में शुरू हुई, लेकिन झांकियां औपचारिक रूप से 1952 में शामिल की गईं। शुरुआती सालों में झांकियों की संख्या काम कम होती थीं। और साथ ही उनका रूप भी अभी तरह का भव्यात्मक नहीं होता था। 'झांकी' संस्कृत और प्राकृत शब्द है, जिसका मतलब है नजारा या झलक। पहले झांकियां मंदिरों के रथ उत्सव और भक्ति काल की जुलूसों से प्रेरित हुआ करती थीं। कई झांकियों पर लोग जमे हुए पोज में खड़े होकर लोककथाएं, खेती या पौराणिक दृश्य दिखाते थे। गणतंत्र दिवस परेड में हर साल आमतौर पर 22 से 30 झांकियां होती हैं। ये राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, मंत्रालयों और प्रमुख सरकारी संस्थाओं की होती हैं। इनमें संगीत, लोक नृत्य, स्थानीय कपड़े और थीम वाली कहानियां दिखाकर भारत की संस्कृति, इतिहास और विकास के काम दिखाए जाते हैं।

झांकियों के प्रारूप में हुआ बदलाव

पहले झांकियां एकता की मिसाल को प्रदर्शित करी थीं, वे विवधता में एकरूपता बताती थीं, पर अब हाई-टेक वाली प्रगति की तस्वीर पेश करती हैं। ये झांकियां सिर्फ परेड का हिस्सा नहीं, बदलते भारत का आईना हैं। हम गरीब से अमीर, पिछड़े से आगे, साधारण से तकनीकी देश बने। लेकिन विविधता बरकरार – हर राज्य अपनी कहानी लाता है। अब जब हम झांकियां देखते हैं, तो याद आता है – 1950 का साधारण भारत आज दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है, स्पेस पावर, डेमोक्रेसी की मिसाल।

इस बार की थीम है ये

2026 की थीम स्वतंत्रता का मंत्र- वंदे मातरम और समृद्धि का मंत्र- आत्मनिर्भर भारत है। उल्लेखनयी है कि इस बार राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को 150 साल पूरे हुए है। साथ ही ये तय किया गया है कि इस बार किसी भी झांकी मे प्लास्टिक का प्रयोग नहीं किया जाएग और न ही कोई लोगो प्रदर्शित किया जाएगा। झांकियों पर नाम लिखने का भी क्रम तय है, झांकी के फ्रंट में हिंदी मे नाम लिखा जाएगी और बैकसाइड पर अंग्रेजी में।

साल दर साल यूं आया बदलाव

झांकियां हमें बताती हैं कि विकास सिर्फ अर्थशास्त्र नहीं, संस्कृति, पर्यावरण, सामाजिक न्याय सबको साथ लेकर चलना है। आप कह सकते हैं कि झांकियों में 1970-80 के दशक में बदलाव आने लगा। अब झांकियां सिर्फ संस्कृति नहीं, सामाजिक मुद्दों पर फोकस करने लगीं। केरल ने 1976 में साक्षरता अभियान दिखाया।

तमिलनाडु ने भरतनाट्यम नृत्य पेश किया। झांकियां 1991 के बाद उद्योग और शहरों की तरफ मुड़ीं। तब देश में आर्थिक उदारीकरण की बयार बहने लगी थी। असली बदलाव 1990 और 2000 के शुरुआत में आया। झांकियां बड़ी और कुछ हटकर बनने लगीं। ये हाई-टेक भी हो गईं। डीआरडीओ (DRDO) की झांकी 2000 के बाद गणतंत्र दिवस परेड का नियमित हिस्सा बनने लगीं। ये भारत की रक्षा प्रौद्योगिकियों और आत्मनिर्भरता को दर्शाती है, जिसमें नवीनतम मिसाइलें, रडार सिस्टम, ड्रोन रोधी प्रणालियां, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियां, और स्वदेशी हथियार प्रदर्शित किए जाने लगे। इनका थीम अक्सर 'रक्षा कवच' होता है।

रोटोशन प्रोसेस की हुई पहल

कृषि मंत्रालय (या संबंधित कृषि निकाय जैसे ICAR) की झांकी गणतंत्र दिवस परेड का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है, जो अक्सर जैविक खेती, मोटे अनाज (मिलेट्स), पशुधन, या कृषि नवाचारों जैसे विषयों पर केंद्रित होती है। इसकी 2023 में 'मिलेट ईयर' पर आधारित झांकी थी। इस बीच, सरकार ने 2024 में नया रोटेशन सिस्टम शुरू हुआ, ताकि हर राज्य/केंद्र शासित प्रदेश को हर तीन साल में कम से कम एक बार मौका मिले। पिछले साल 2025 की थीम थी 'स्वर्णिम भारत: विरासत और विकास'। बीते साल 16 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की झांकियां निकलीं। उत्तर प्रदेश की महाकुंभ मेला को दर्शाती झांकी को बहुत पसंद किया गया था।

इस बार नहीं होगी दिल्ली की झांकी

चूंकि गणतंत्र दिवस का मुख्य आयोजन दिल्ली में होता है, इसलिए दिल्ली की झांकी को देखने के लिए जनता खासी उत्सुक रहती है। वैसे भी दिल्ली लघु भारत है। दिल्ली की झांकी 1952 की परेड का हिस्सा थी। दिल्ली की शुरुआती दौर की झांकियां में सामाजिक और केन्द्र सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं पर ही फोकस रहता था। पर इस बार पब्लिक को दिल्ली की झांकी देखने को नहीं मिलेगी। गौरतलब है कि पिछले दो दशकों में सात बार दिल्ली की झांकी दर्शकों को देखने को मिली है। इस बार 11 राज्यों की झांकियां गणतंत्र दिवस परेड का हिस्सा नहीं है।

दिल्ली की 1965 की झांकी में देश के कृषि क्षेत्र में बढ़ते कदमों को दिखाया। तब तक देश में हरित क्रांति आ चुकी थी और उस महान क्रांति की नींव राजधानी के भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र ( पूसा) और जोंती गांव में ही रखी गई थी। 1965 की झांकी में जोंती के किसान भी शामिल थे। दिल्ली की 1966 की झांकी में सबको शिक्षा देने का वादा था। 1978 में वयस्क शिक्षा और 1979 की झांकी में शराबबंदी पर फोकस था। लेकिन 1990 के दशक बाद दिल्ली को विधान सभा मिल गई। तब यहां की झांकियों का रंग यहां के समाज से मेल खाने लगा।

इसका नमूना मिला 1993 में जब दिल्ली की झांकी में यहां की गंगा-जमुनी तहजीब को पेश किया गया। इससे मिलती-जुलती थीम पर 1999 में शाहजहांबाद की जान और शान चांदनी चौक के जीवन, समाज और संस्कृति पर झांकी निकली थी। इसे बहुत पसंद किया गया था। करगिल की जंग विषय था दिल्ली की झांकी का साल 2000 में। करगिल की जंग में कैप्टन अनुज नैयर और कैप्टन मोहम्मद हनीफउद्दीन समेत दिल्ली के कई शूरवीरों ने अपनी जान का नजराना दिया था। अमीर ख़ुसरो के जीवन पर आधारित झांकियां साल 2000 और फिर 2004 में निकलीं।

मिर्जा गालिब की शख्सियत पर 2001 में झांकी निकली थी। मेट्रो रेल 2003 तथा 2006 दिल्ली की झांकी के फोकस में रही। दिल्ली की 2019 की झांकी में महात्मा गांधी पर फोकस किया गया। इसमें महात्मा गांधी के दिल्ली में बिताए गए 720 दिनों को दर्शाया गया ।

महत्पूर्ण ये है कि इन झांकियों का काम 26 जनवरी को खत्म नहीं होता। बाद में इसमें से कई सार्वजनिक जगहों पर लगाई जाती हैं या सांस्कृतिक आयोजनों, प्रदर्शनियों और स्कूलों में इस्तेमाल होती हैं। ये जैव-विविधता, विरासत संरक्षण, शहर के विकास और सामाजिक कामों के बारे में जागरूकता फैलाती रहती हैं।

Updated on:
25 Jan 2026 12:10 pm
Published on:
25 Jan 2026 11:19 am
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