
पश्चिम बंगाल की सड़कों पर अब तृणमूल कांग्रेस के दो चेहरे आमने-सामने हैं। एक तरफ ममता बनर्जी का नाम सामने है, दूसरी तरफ विधानसभा में संख्या बल वाले बागी टीएमसी नेता हैं।
दोनों खेमा खुद को असली तृणमूल बता रहे हैं। 28 अगस्त को कोलकाता में छात्र परिषद के स्थापना दिवस पर यह लड़ाई और तेज होने वाली है। दोनों गुट उसी दिन अलग-अलग बड़े कार्यक्रम रख रहे हैं। नजर इस बात पर रहेगी कि कौन ज्यादा भीड़ जुटाता है और कौन युवा कार्यकर्ताओं का मन जीतता है।
मई के चुनाव नतीजों के बाद पार्टी के अंदर दरार साफ हो गई। बागी गुट को करीब 60 विधायकों का साथ मिला। इसके बाद ऋतब्रत बनर्जी को विपक्ष का नेता मान लिया गया।
उनके साथ फिरहाद हकीम, मदन मित्रा, अनुब्रत मंडल और जावेद खान जैसे पुराने चेहरे भी हैं। ये सब कभी ममता के करीबी माने जाते थे। इस गुट का कहना है कि संगठनात्मक ताकत और विधायकों का समर्थन असली ताकत है। विधानसभा में मिली मान्यता ने उन्हें संस्थागत मजबूती दी है।
दूसरी तरफ ममता बनर्जी का कालीघाट गुट है। ये लोग कहते हैं कि सिर्फ संख्या से ममता की पहचान नहीं मिट सकती। ममता का व्यक्तित्व, वाम मोर्चा के खिलाफ उनके आंदोलन और 2011 में सत्ता दिलाने वाली यात्रा इस गुट की पूंजी है। पार्टी में फैसले लंबे समय से कालीघाट स्थित उनके आवास से ही होते रहे हैं। एक समय लोग कहते थे कि तृणमूल में एक ही पद है, बाकी सब लैंपपोस्ट।
इसी साल 21 जुलाई को दोनों गुटों ने कोलकाता में अलग-अलग रैलियां निकालीं। यह दिन तृणमूल के लिए शहीद दिवस है। 1993 में युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर पुलिस फायरिंग की याद में मनाया जाता है।
उस समय ममता खुद नेतृत्व कर रही थीं। ऋतब्रत गुट ने मेयो रोड पर रैली की। ममता की सभा बिरला तारामंडल के पास थी। दोनों जगह अच्छी संख्या में लोग पहुंचे। एक ही दिन दो ताकत दिखावे ने पार्टी के अंदरूनी विभाजन को सबके सामने ला दिया।
बता दें कि छात्र संगठन टीएमसीपी लंबे समय से पार्टी का मजबूत आधार रहा है। जो इस पर कब्जा जमाएगा, वही आगे युवा वोट और पार्टी की पहचान पर असर डालेगा।
अब 28 अगस्त का दिन महत्वपूर्ण है। दोनों पक्ष टीएमसीपी पर अपना प्रभाव जमाने की कोशिश में हैं। जो युवा कार्यकर्ताओं को साथ लाएगा, वही असली तृणमूल का दावा मजबूत करेगा।