Self-Reliance: मेजर जनरल रानूसिंह राठौड़ का विशेष इंटरव्यू। जानें कैसे स्वदेशी अर्जुन टैंक, ब्रह्मोस और S-400 के दम पर भारतीय सेना बनी दुनिया की महाशक्ति।
Army day Interview:आज की भारतीय सेना 1971 या 90 के दशक वाली फौज नहीं है। भारत अब रक्षा क्षेत्र में 'आत्मनिर्भर' बन चुका है। एक समय था जब हम अपनी सैन्य जरूरतों के लिए 90% तक रूस पर निर्भर थे, लेकिन आज यह निर्भरता घट कर 15% से भी कम रह गई है। भारतीय थल सेना दिवस (Indian Army ) के मौके पर सियाचिन, जम्मू कश्मीर, कारगिल, लेह लद्दाख सैक्टर, अरुणाचल प्रदेश व श्रीलंका सीमा पर अहम भूमिका निभा चुके डिफेंस एक्सपर्ट मेजर जनरल (रिटायर्ड) रानूसिंह राठौड़ (Major General Ranusingh Rathore) ने पत्रिका के डिफेंस रिपोर्टर के साथ एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में यह बात बताई।
एनडीसी दिल्ली से एम फिल इन नेशनल व इंटरनेशनल सिक्योरिटी एंड स्ट्रेटेजी मेजर जनरल राठौड़ ने बताया, भारत अब न केवल टैंकों का संचालन कर रहा है, बल्कि उन्नत अर्जुन टैंक और T-90 की एम्युनिशन (गोला-बारूद) क्षमता को भी देश में ही विकसित कर रहा है। एंटी-टैंक गन के मामले में भारत अब दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। सबसे बड़ा बदलाव आर्टिलरी यानि तोपखाने में आया है। पहले हमारी तोपों की रेंज 30 किमी तक सीमित थी, लेकिन अब बोफोर्स की जगह नई स्वदेशी तोपें आ रही हैं, जिनकी मारक क्षमता 40 किमी से भी अधिक है। इसके साथ ही 'हाउजर' तोपों के आने से सेना की फायर पॉवर कई गुना बढ़ गई है।
उन्होंने हथियारों की तकनीक पर बात करते हुए कहा कि ब्रह्मोस मिसाइल आज हमारी तीनों सेनाओं (थल, वायु और नौसेना) की रीढ़ बन चुकी है। यह एक ऐसा लॉन्ग रेंज वैपन है, जिसका तोड़ फिलहाल किसी के पास नहीं है। वहीं, एयर डिफेंस के मामले में S-400 सिस्टम भारत की बड़ी उपलब्धि है। राठौड़ ने बताया कि S-400 की खासियत यह है कि यह दुश्मन के हमले को सीमा पार ही पहचान कर नष्ट कर देगा। दिलचस्प बात यह है कि जहाँ रूस हमें यह सिस्टम दे रहा है, वहीं अमेरिका भी अब भारत को अपना डिफेंस सिस्टम देने की पेशकश कर रहा है।
मेजर जनरल राठौड़ ने कहा कि कोविड-19 के बाद भारतीय सेना बहुत बदल गई है। उरी, पुलवामा और गलवान घाटी की घटनाओं ने हमें और सतर्क किया है। आज लेह-लद्दाख की दुर्गम चोटियों पर तैनात हमारे जवानों के पास आधुनिक बुलेटप्रूफ जैकेट और नई राइफलें हैं। सन 1971 के दौर में जहाँ हमारे पास पॉइंट थ्री जीरो राइफलें थीं, वहीं अब 5.56 एमएम और उससे भी उन्नत रेपिड फायर राइफलें आ गई हैं। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) के जरिये देश में ही छोटे हथियारों की रेंज और क्षमता बढ़ाई जा रही है।
उन्होंने बताया,"सियाचिन जैसे दुर्गम सेक्टर में जहाँ तापमान -16 से -50 डिग्री तक गिर जाता है, वहाँ तैनात एक जवान की सुरक्षा के लिए 'स्पेशलाइज क्लोदिंग किट' पहले स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रिया से आयात की जाती थी। इस एक किट की कीमत लगभग एक करोड़ रुपये आती थी। लेकिन अब DRDO और भारत के प्राइवेट सेक्टर ने मिलकर इसे देश में ही बनाना शुरू कर दिया है। अब सियाचिन में इस्तेमाल होने वाले विशेष जूते (Bूट), स्लीपिंग बैग और माउंटेनियरिंग इक्विपमेंट पूरी तरह स्वदेशी हैं, जो 'आत्मनिर्भर भारत' की बड़ी जीत है।"
इंटरव्यू के दौरान उन्होंने पड़ोसी देशों की चालों और चालबाजियों पर भी बात की। उन्होंने बताया कि चीन ने पाकिस्तान में JF-17 एयरक्राफ्ट बनाने में मदद की है, जो वे अब बांग्लादेश और अरब देशों को बेचने की तैयारी में हैं। भारत इस तरह के गठजोड़ पर पूरी नजर बनाए हुए है और अपनी मिसाइल रेजीमेंट को इसी के अनुरूप तैयार कर रहा है।
बहरहाल मेजर जनरल रानूसिंह राठौड़ के इस इंटरव्यू से साफ है कि भारतीय सेना अब 'इम्पोर्ट' (आयात) के बजाय 'मेक इन इंडिया' पर फोकस कर रही है। लॉन्ग रेंज मिसाइलें, उन्नत एंटी-टैंक गन और मजबूत डिफेंस सिस्टम ने भारत को वैश्विक पटल पर एक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर दिया है।