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Galgotias University का वायरल हुआ सच! चीनी रोबो-डॉग के बाद अब ‘कोरियाई सॉकर ड्रोन’ पर हंगामा

Controversy : गलगोटियास यूनिवर्सिटी फिर सुर्खियों में है। चीनी रोबो-डॉग के बाद अब 'कोरियाई सॉकर ड्रोन' को छात्रों का आविष्कार बताने पर सोशल मीडिया यूजर्स ने यूनिवर्सिटी की भारी ट्रोलिंग शुरू कर दी है।

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Feb 18, 2026
गलगोटियास विश्वविद्यालय का वायरल सच। (सांकेतिक फोटो : AI)

Galgotias University : गलगोटियास यूनिवर्सिटी (Galgotias University) एक बार फिर सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बन गई है। अभी कुछ ही समय पहले चीनी 'रोबो-डॉग' (Robodog) को अपना बता कर सुर्खियों में आया यह विश्वविद्यालय, अब एक नए विवाद में फंसता हुआ नजर आ रहा है। इस बार मामला एक 'सॉकर ड्रोन' (Soccer Drone) से जुड़ा हुआ है। सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि ग्रेटर नोएडा स्थित इस यूनिवर्सिटी के छात्रों ने जिस ड्रोन को अपनी 'इनोवेशन' के रूप में पेश किया, वह असल में एक कोरियाई तकनीक है।

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आखिर क्या है ये पूरा मामला? (Robodog)

इंटरनेट पर वायरल हो रही तस्वीरों और वीडियो में एक ड्रोन दिखाई दे रहा है जो एक गोलाकार सुरक्षा कवच (Spherical Cage) के अंदर है। इस तरह के ड्रोन का इस्तेमाल आम तौर पर 'ड्रोन सॉकर' (Drone Soccer) खेलों में किया जाता है, जो दक्षिण कोरिया में बेहद लोकप्रिय है। सोशल मीडिया यूजर्स और ऑनलाइन जासूसों (Internet Sleuths) ने दावा किया है कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी के छात्रों की ओर से प्रदर्शित किया गया यह मॉडल, कोरियाई बाजार में उपलब्ध रेडीमेड ड्रोन जैसा ही है। आरोप है कि यह ड्रोन (Korean Drone) छात्रों के स्क्रैच से नहीं बनाया गया, बल्कि इसे बाहर से मंगवा कर या खरीदकर 'मेड इन इंडिया' प्रोजेक्ट के रूप में पेश करने की कोशिश की गई है। तस्वीर में दिख रहा ड्रोन डिजाइन, कोरियाई कंपनी 'कैमटो' (Camtoy) या इसी तरह के अन्य अंतरराष्ट्रीय ब्रांड्स के सॉकर ड्रोन से हू-ब-हू मिलता है।

चीनी रोबो-डॉग के बाद दूसरी फजीहत (Copy Paste Engineering)

यह विवाद तब और गहरा गया है क्योंकि हाल ही में इसी यूनिवर्सिटी का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें एक 'रोबो-डॉग' दिखाया गया था। छात्रों ने दावा किया था कि उन्होंने इसे बनाया है, लेकिन सोशल मीडिया यूजर्स ने जल्द ही पोल खोल दी थी। वह रोबो-डॉग कथित तौर पर चीनी कंपनी 'Unitree' का मॉडल था, जिस पर से मूल कंपनी का नाम छिपाने की कोशिश की गई थी। जैसे ही रोबो-डॉग का मामला ठंडा पड़ने लगा, अब इस 'सॉकर ड्रोन' की तस्वीरों ने आग में घी डालने का काम किया है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या प्रोजेक्ट्स के नाम पर सिर्फ स्टिकर बदलने का काम हो रहा है?

'स्टिकर इंजीनियरिंग' पर सवाल (Viral Truth)

तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि इंजीनियरिंग कॉलेजों में प्रोजेक्ट्स खरीदना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसे 'नवाचार' बताकर राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित करना गंभीर मुद्दा है। वायरल हो रहे ड्रोन के वीडियो में देखा जा सकता है कि यह एक प्रोटेक्टिव केज (पिंजरे) में है, जो इसे टकराने पर टूटने से बचाता है। यह तकनीक विशेष रूप से इंडोर ड्रोन फुटबॉल के लिए विकसित की गई थी। इसे अपना मूल शोध (Original Research) बताना न केवल अनैतिक है, बल्कि उन छात्रों के साथ भी अन्याय है जो वास्तव में कड़ी मेहनत कर रहे हैं।

सोशल मीडिया बना फैक्ट-चेकर ( Fact-checker)

आज के दौर में सोशल मीडिया सबसे बड़ा 'फैक्ट-चेकर' बन गया है। जैसे ही यह वीडियो सामने आया, रेडिट (Reddit) और ट्विटर (X) पर लोगों ने असली कोरियाई ड्रोन के लिंक और तस्वीरें साझा करनी शुरू कर दीं। यूजर्स का कहना है कि यूनिवर्सिटी को अपने दावों की जांच करनी चाहिए थी।

सोशल मीडिया पर तीखी और व्यंग्यात्मक प्रतिक्रियाएं (Social Media)

मीम्स की बाढ़: कई यूजर्स गलगोटियास यूनिवर्सिटी को 'AliExpress University' या 'Amazon Prime College' कह कर बुला रहे हैं। उनका कहना है कि "यहाँ ऑर्डर दिया जाता है, बनाया नहीं जाता।"

शिक्षा प्रणाली पर तंज

एक यूजर ने लिखा, "यह समस्या सिर्फ एक कॉलेज की नहीं है, बल्कि हमारे प्रोजेक्ट कल्चर की है। छात्र बाजार से प्रोजेक्ट खरीदते हैं और प्रोफेसर उसे पास कर देते हैं।"

टेक कम्युनिटी के कमेंट्स

टेक कम्युनिटी के लोगों ने लिखा कि "असेंबल करना (Assemble) और आविष्कार करना (Invent) दो अलग बातें हैं। छात्रों को असेंबलिंग सीखने में कोई बुराई नहीं है, लेकिन उसे अपना आविष्कार बताना झूठ है।" इस मामले में अब तक यूनिवर्सिटी प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

शिक्षा जगत : जांच करवाने की मांग

शिक्षा जगत से जुड़े कुछ लोगों का मानना है कि एआईसीटीई (AICTE) और यूजीसी (UGC) को इस तरह के 'फर्जी इनोवेशंस' पर संज्ञान लेना चाहिए, क्योंकि यह भारतीय शिक्षा की छवि को वैश्विक स्तर पर नुकसान पहुंचा सकता है। अब देखना यह होगा कि क्या यूनिवर्सिटी इन दावों का खंडन करती है या फिर रोबो-डॉग मामले की तरह इस पर भी चुप्पी साध लेती है। क्या वे इसका कोई तकनीकी ब्लूप्रिंट (Blueprint) या कोड साझा करेंगे जो इसे उनका अपना साबित कर सके?

विवाद का सबसे दुखद पहलू : असली टैलेंट का क्या होगा ?

इस पूरे विवाद का सबसे दुखद पहलू यह है कि जब ऐसे 'फेक' या 'रिब्रांडेड' प्रोजेक्ट्स को सुर्खियां मिलती है, तो वे छात्र हताश होते हैं जो लैब्स में रातों को जाग कर असली मेहनत कर रहे हैं। भारत में स्टार्टअप और इनोवेशन का कल्चर बढ़ रहा है, लेकिन ऐसी घटनाएं निवेशकों और इंडस्ट्री का भरोसा कम कर सकती हैं। यह सवाल पैदा करता है कि क्या हम दुनिया को दिखाने के लिए 'शॉर्टकट' अपना रहे हैं?

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