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उमर खालिद-शरजील इमाम को जमानत नहीं मिलने पर सुप्रीम कोर्ट ने दी प्रतिक्रिया, अपने ही फैसले पर जताई आपत्ति

Umar Khalid, Sharjeel Imam: सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगे मामले के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को बेल न देने के अपने ही पुराने फैसले पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि स्पीडी ट्रायल और केए नजीब फैसले के सिद्धांतों को यहां सही तरीके से लागू नहीं किया गया था।
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Updated: 18 May 2026, 12:55 PM IST
Umar Khalid, Sharjeel Imam
उमर खालिद, शरजील इमाम (फोटो- CPI (M) एक्स पोस्ट)

Umar Khalid, Sharjeel Imam: दिल्ली दंगा साजिश मामले में पूर्व जेएनयू छात्र नेता उमर खालिद और शरजील इमाम को बेल देने से इनकार करने वाले अपने ही पुराने फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि पहले दिए गए निर्णय में लंबे समय तक जेल में रहने और स्पीडी ट्रायल के अधिकार से जुड़े स्थापित कानूनी सिद्धांतों को सही तरीके से लागू नहीं किया गया। इस टिप्पणी ने गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम यानी अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट (UAPA) के तहत गिरफ्तारी और बेल प्रक्रिया को लेकर नई बहस शुरू कर दी है। कानूनी विशेषज्ञ इसे आने वाले मामलों के लिए महत्वपूर्ण संकेत मान रहे हैं।

सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को बेल देते हुए की टिप्पणी

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने यह टिप्पणी उस समय की जब अदालत ने सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को बेल दी। अंद्राबी छह साल से अधिक समय से हिरासत में थे और उन पर मादक पदार्थों की सप्लाई के जरिये आतंक वित्तपोषण का आरोप था। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि 2021 में यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केए नजीब मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि अगर किसी आरोपी का स्पीडी ट्रायल का मौलिक अधिकार प्रभावित होता है तो संवैधानिक अदालतें यूएपीए मामलों में भी बेल दे सकती हैं। अदालत ने माना कि यही सिद्धांत उमर खालिद मामले में प्रभावी तरीके से लागू नहीं हुआ।

छोटी पीठ के लिए बड़ी पीठ के फैसले का पालन अनीवार्य- कोर्ट

पीठ ने जनवरी 2026 में दिए गए उस फैसले का उल्लेख किया जिसमें उमर खालिद और शरजील इमाम को बेल देने से इनकार कर दिया गया था। अदालत ने यह भी याद दिलाया कि उमर खालिद की पुनर्विचार याचिका अप्रैल में खारिज हो चुकी है। न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने कहा कि अदालत को यह स्वीकार करने में कठिनाई हो रही है कि छोटे पीठ द्वारा दिए गए फैसले ने तीन न्यायाधीशों वाली बड़ी पीठ के सिद्धांतों से अलग रास्ता अपनाया। उन्होंने कहा कि न्यायिक अनुशासन के तहत छोटी पीठ को बड़ी पीठ के फैसले का पालन करना अनिवार्य होता है।

यूएपीए कानून पर बढ़ सकती है बहस

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को केवल एक मामले तक सीमित नहीं माना जा रहा। कानूनी जानकारों का कहना है कि इससे यूएपीए के तहत लंबी हिरासत, धीमी जांच और बेल प्रक्रिया पर नई बहस तेज हो सकती है। मानवाधिकार संगठनों ने पहले भी आरोप लगाया है कि कई मामलों में सुनवाई पूरी होने से पहले आरोपी वर्षों जेल में रहते हैं। अब अदालत की हालिया टिप्पणी से भविष्य में बेल याचिकाओं पर असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है। राजनीतिक हलकों में भी इस फैसले को लेकर चर्चा बढ़ गई है।

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18 May 2026, 12:55 PM IST
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