
उमर खालिद और शरजील इमाम (फोटो- एएनआई)
दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली है। कोर्ट ने 5 अन्य आरोपियों को सशर्त जमानत देते हुए खालिद और इमाम की जमानत याचिका को खारिज कर दिया है। साथ ही कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि यह दोनों आरोपी अगले एक साल तक इस मामले में दुबारा जमानत याचिका दायर नहीं कर सकते हैं। कोर्ट ने यह फैसला सुनाते हुए यह साफ किया कि जमानत के मामले में सभी आरोपियों को समान नहीं देखा जा सकता है।
यह फैसला जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस एन वी अंजारिया की बेंच ने सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद जैसे अन्य आरोपियों के निरंतर कारावास को आवश्यक नहीं माना और उनकी जमानत मंजूर कर ली है। हालांकि कोर्ट ने यह साफ किया है कि इन लोगों को जमानत मिलने से इनके आरोपों में कमी नहीं आई है। इन लोगों को 12 शर्तों के साथ कोर्ट ने जमानत दी है अगर इन शर्तों का उल्लंघन होता है तो इनकी जमानत रद्द हो जाएगी।
खालिद और इमाम की याचिका अस्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि उनका मामला अन्य आरोपियों से अलग है और इनके खिलाफ प्रथम दृष्टया आरोप सिद्ध होते हैं। इनके मामले में वैधानिक सीमा लागू होती है इसलिए इस चरण में उन्हें जमानत देना सही नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में खालिद और इमाम की भूमिका षड़यंत्रकारी थी जबकि बाकी आरोपियों ने उनके द्वारा दी गई दिशा में काम किया। मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोजन पक्ष ने आरोपियों की जो भूमिकाएं बताई हैं, उन्हें देखते हुए कोर्ट ने हर आरोपी की अर्जी पर अलग-अलग विचार किया है। समानता का नियम मशीन की तरह हर जमानत के मामले में लागू नहीं किया जा सकता है।
कोर्ट ने कहा, संविधान का अनुच्छेद 21 सबको समानता का अधिकार देता है। ऐसे में किसी व्यक्ति को बिना ठोस सबूत लंबे समय तक जेल में नहीं रखा जा सकता है। यदि किसी व्यक्ति को 'प्रोलॉन्गड प्री-ट्रायल कस्टडी' (आरोपी को अदालत का फैसला आने से पहले ही लंबे समय तक जेल में बंद रखना) में रखा जाता है तो सरकार को इसका ठोस कारण कोर्ट को बताना होगा। कोर्ट ने यह साफ किया कि खालिद और इमाम के मामले में पुलिस और अभियोजन पक्ष ने जो सबूत पेश किए है वे पहली नजर में इन दोनों के खिलाफ लगे आरोपों को सही साबित करते हैं। इन दोनों पर लगाए गए कानूनों की कड़ी शर्तें इन दोनों पर पूरी तरह से लागू होती है इसलिए केस की मौजूदा स्थिति को देखते हुए कोर्ट को इन्हें जमानत देना उचित नहीं लगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि UAPA के मामलों में ट्रायल में देरी होने का मतलब यह नहीं है कि आरोपी को अपने आप जमानत मिल जाएगी या कानून के नियम उस पर लागू नहीं होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा, UAPA की धारा 43D(5) जमानत को मुश्किल बना देती है पर कोर्ट आंख मूंदकर पुलिस की बात नहीं मानता है बल्कि प्रथम दृष्टया सबूतों के आधार पर सुनवाई करता है। कोर्ट ने कहा कि खालिद और इमाम पर धारा 43D(5) के तहत तय की गई शर्तें अभी भी लागू होती हैं और उनका अब तक जेल में रहना संवैधानिक मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता है। इसलिए कानून द्वारा उनकी जमानत पर लगाई गई रोक को हटाया नहीं जा सकता है।
Updated on:
5 Jan 2026, 3:41 PM IST
Published on:
5 Jan 2026, 3:41 PM IST
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