
UGC Rules Supreme Court Stay: उच्च शिक्षा से जुड़े नए UGC नियमों को लेकर देशभर में बहस तेज है। कुछ इन नियमों को सामाजिक न्याय की दिशा में कदम बता रहे हैं, तो कुछ इन्हें सामान्य वर्ग विरोधी बता रहे हैं। UGC पर बढ़ते विवादों के बीच चर्चित शिक्षक और यूट्यूबर डॉ. विकास दिव्यकीर्ति का बयान सामने आया है।
उन्होंने साफ कहा कि वह सामान्य वर्ग से आते हैं और वह आरक्षण और सोशल जस्टिस के समर्थक हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि नए नियमों को लेकर जो डर दिखाया जा रहा है, वह काफी हद तक “फियर साइकोसिस” है, यानी एक प्रकार की मनोविकृति जिसमें वास्तविकता नहीं बल्कि भ्रम शामिल होता है।
ANI को दिए एक इंटरव्यू में विकास दिव्यकीर्ति ने कहा कि उनका स्टैंड शुरू से साफ रहा है। उन्होंने कहा, "बाय चांस, मैं जनरल कैटेगरी से हूं, लेकिन मैं हमेशा से आरक्षण और सामाजिक न्याय का समर्थक रहा हूं।"
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी चीज का समर्थन करने का मतलब यह नहीं होता कि हर नीति को आंख बंद करके स्वीकार कर लिया जाए। अगर किसी नियम या प्रावधान में कुछ कमियां हैं, तो उस पर सवाल उठना या पूछना चाहिए।
दिव्यकीर्ति ने आगे कहा कि आरक्षण के नाम पर आने वाली हर नीति सही हो, यह जरूरी नहीं है। अगर कुछ गलत लगता है, तो आलोचना करनी चाहिए। यह लोकतंत्र का हिस्सा है।
विकास दिव्यकीर्ति ने नए UGC नियमों पर बात करते हुए कहा कि नए नियमों पर जो हंगामा हो रहा है, वह असल में डर से ज्यादा अफवाहों और बातों को बढ़ा-चढ़ाकर करने का नतीजा है।
उन्होंने कहा कि कई बार समाज में किसी मुद्दे को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है और लोग बिना पूरी जानकारी के घबरा जाते हैं। दिव्यकीर्ति ने कहा कि नए नियमों से डरने की बात उतनी नहीं है, जितना समाज में दिखाई दे रही है।
हालांकि, उन्होंने माना कि अगर नियम थोड़ी और सावधानी से बनाए जाते, तो विवाद की स्थिति कम हो सकती थी। उनका मानना है कि नए नियम कुछ हड़बड़ी में लाए गए हैं, जबकि इसके लिए पर्याप्त समय था।
UGC के नए नियमों के विरोध में कई जगह विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट के द्वारा अंतरिम रोक लगाने से विवाद और बढ़ गया है। कोर्ट में दायर याचिकाओं में कहा गया है कि जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा समावेशी नहीं है।
इसमें कुछ वर्गों को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखा गया है। नए नियमों में उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता समितियां बनाना अनिवार्य किया गया है। इनमें ओबीसी, एससी, एसटी, महिलाओं और दिव्यांग सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान है।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नए नियमों में भेदभाव को केवल कुछ वर्गों तक सीमित करना सही नहीं है।