लोकसभा परिसीमन को लेकर देश में बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। सरकार 543 सीटों को बढ़ाकर 850 तक करने की तैयारी में है, जिससे उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक संतुलन और सत्ता समीकरण बदलने की चर्चा तेज हो गई है।
भारत में आगामी लोकसभा चुनाव 2029 से पहले परिसीमन को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। केंद्र सरकार लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 करने की तैयारी में है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य बढ़ती आबादी के अनुसार प्रतिनिधित्व तय करना और संसद में 33% महिला आरक्षण लागू करना है। हालांकि, इस प्रस्ताव ने उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक संतुलन को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।
परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसमें जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं और सीटों की संख्या तय की जाती है। इसका उद्देश्य हर राज्य को उसकी आबादी के अनुपात में उचित प्रतिनिधित्व देना होता है। भारत में पहला डिलिमिटेशन 1952 में हुआ था और आखिरी बार 2002 में सीमाओं में बदलाव किया गया था, लेकिन सीटों की संख्या 543 ही रखी गई थी। 2011 की जनगणना के अनुसार देश की आबादी 1971 के मुकाबले दोगुनी हो चुकी है, जिससे सीटों के पुनर्वितरण की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
सरकार के प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा सीटों की संख्या 850 तक बढ़ाई जा सकती है, जिसमें 815 सीटें राज्यों और 35 केंद्र शासित प्रदेशों को मिलेंगी। यह प्रक्रिया 2011 की जनगणना के आधार पर होगी और इसके लिए नया परिसीमन आयोग गठित किया जाएगा। इसी के साथ 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून के तहत 1/3 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएंगी, जिन्हें रोटेशन के आधार पर लागू किया जाएगा। माना जा रहा है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों को इसका सबसे ज्यादा फायदा होगा।
इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा विरोध दक्षिण भारत के राज्यों और विपक्षी दलों ने किया है। उनका कहना है कि केवल जनसंख्या को आधार बनाने से उन राज्यों को नुकसान होगा, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता हासिल की है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार दक्षिणी राज्यों को “सजा” देना चाहती है और चेतावनी दी कि इससे बड़े स्तर पर विरोध प्रदर्शन हो सकते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिलाओं को संबोधित एक सार्वजनिक पत्र में जोर देकर कहा कि अगर 2029 में लोकसभा और विभिन्न विधानसभाओं के चुनाव पूरी तरह से महिला कोटा लागू होने के साथ होते हैं, तो भारतीय लोकतंत्र अधिक मजबूत और जीवंत हो जाएगा।"
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने आरोप लगाया कि केंद्र उन दक्षिणी राज्यों को दंडित करने की कोशिश कर रहा है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण की पहल लागू की थी। उन्होंने कहा कि "केंद्र इस मामले में अपनी 'साजिश' को कानून के रूप में लागू करने की योजना बना रहा है।" उन्होंने एक वीडियो संदेश में चेतावनी भी दी कि "अगर राज्य को नुकसान पहुंचाने के लिए कुछ भी किया गया या परिसीमन में उत्तरी राज्यों की राजनीतिक शक्ति को असमान रूप से बढ़ाया गया, तो भारी आंदोलन और 'पूरी ताकत के साथ विरोध' किया जाएगा।"
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री और दक्षिणी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से लोकसभा सीटों के केवल जनसंख्या-आधारित विस्तार को खारिज करने की औपचारिक अपील की है। उन्होंने एक खुले पत्र में चेतावनी दी कि "सीटों की संख्या को आनुपातिक रूप से (pro-rata) बढ़ाकर 850 करना उन राज्यों को दंडित करेगा जिन्होंने सफलतापूर्वक जनसंख्या नियंत्रण किया है।" इसके बजाय उन्होंने एक "हाइब्रिड मॉडल" का प्रस्ताव दिया जो आर्थिक योगदान और विकासात्मक प्रदर्शन को पुरस्कृत करता हो।
पार्टी के महासचिव जयराम रमेश ने विधेयक के पीछे की मंशा को "शरारतपूर्ण" बताया और कहा कि संविधान (131वां संशोधन) विधेयक "बेहद गलत समय" पर लाया गया है। उन्होंने कहा "जब किसी विधेयक के पीछे की मंशा शरारतपूर्ण होती है और उसकी सामग्री कुटिल होती है, तो संसदीय लोकतंत्र को होने वाले नुकसान की सीमा बहुत बड़ी होती है। महिला आरक्षण को आगे लाने की आड़ में, भाजपा एक बेहद त्रुटिपूर्ण, असंवैधानिक और संघवाद-विरोधी परिसीमन अभ्यास को जबरन थोपने की कोशिश कर रही