
देश में मतदाता सूची को अपडेट करने के लिए चुनाव आयोग की ओर से चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर राजनीतिक बहस तेज है।
इस प्रक्रिया का मकसद मतदाता सूची में गलत, दोहराए गए और अयोग्य नामों की पहचान करना और योग्य मतदाताओं के नाम शामिल करना है। लेकिन SIR के तहत नामों की कटौती, नए मतदाताओं के पंजीकरण के नियम और फॉर्म-6 की प्रक्रिया को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं।
विपक्ष ने इसको लेकर जमकर बवाल काटा है। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया से बड़ी संख्या में वास्तविक मतदाताओं के नाम भी सूची से बाहर हो सकते हैं। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची को सही और भरोसेमंद बनाने के लिए उसका समय-समय पर सत्यापन जरूरी है।
इस पूरे विवाद को समझने के लिए SIR की शुरुआत, अब तक की प्रक्रिया, नाम हटने के आंकड़ों, फॉर्म-6 और चुनाव आयोग के जवाब को अलग-अलग समझना जरूरी है। तो आइये, एसआईआर से संबंधित हर छोटी से बड़ी जानकारी के बारे में विस्तार से समझते हैं…
SIR का पूरा नाम Special Intensive Revision है। हिंदी में इसे मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण कहा जाता है। यह चुनाव आयोग की ओर से मतदाता सूची की व्यापक जांच करने की प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि सूची में दर्ज मतदाता सही हैं या नहीं और किसी योग्य नागरिक का नाम छूट तो नहीं गया है।
आमतौर पर मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, पते में बदलाव करने, गलतियों को सुधारने और अयोग्य नाम हटाने का काम होता रहता है। लेकिन एसआईआर के दौरान चुनाव आयोग ज्यादा व्यापक स्तर पर सत्यापन करता है।
इसमें बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क करते हैं और उनसे गणना फॉर्म भरवाते हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक, SIR के दौरान मुख्य रूप से चार तरह की प्रविष्टियों की जांच की जाती है-
आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया से मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाया जा सकता है। हालांकि, विवाद इस बात पर है कि अगर किसी मतदाता से बीएलओ का संपर्क नहीं हो पाता, तो क्या सिर्फ इसी आधार पर उसका नाम हटाना उचित है? और अगर किसी योग्य मतदाता का नाम गलती से हट जाता है, तो उसे वापस जोड़ने की प्रक्रिया कितनी आसान है?
SIR की मौजूदा प्रक्रिया की शुरुआत बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले हुई थी। इसके बाद चुनाव आयोग ने इसे दूसरे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ाया।
इस तरह SIR बिहार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देशभर की मतदाता सूचियों को नए सिरे से जांचने की बड़ी प्रक्रिया बन गया। अलग-अलग राज्यों में इसकी समयसीमा, मसौदा सूची और दावे-आपत्तियों का कार्यक्रम अलग रहा है।
SIR को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा 13 करोड़ से अधिक नामों के मतदाता सूची से बाहर होने के आंकड़े पर है। द इंडियन एक्सप्रेस की 1 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की मसौदा मतदाता सूचियों से कुल 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटे थे। 3 सितंबर की एक रिपोर्ट में यह आंकड़ा करीब 13.39 करोड़ बताया गया।
पहली बात- यह मसौदा सूची से बाहर हुए नामों का आंकड़ा है। इसे सीधे यह नहीं कहा जा सकता कि इतने करोड़ जीवित और योग्य मतदाताओं का मतदान का अधिकार छीन लिया गया। हटाए गए नामों में मृत मतदाता, स्थायी रूप से स्थान बदल चुके लोग, दोहराए गए नाम और सत्यापन के दौरान नहीं मिल पाए मतदाता शामिल हो सकते हैं।
दूसरी बात- नाम हटने और गलत तरीके से नाम हटने में अंतर है। चुनाव आयोग का कहना है कि नामों को सत्यापन के बाद हटाया जाता है। वहीं, आलोचकों का सवाल है कि क्या हर मामले में पर्याप्त जांच हुई और क्या सही मतदाताओं को अपनी बात रखने का पूरा मौका मिला?
तीसरी बात- मसौदा सूची अंतिम सूची नहीं होती। मसौदा सूची जारी होने के बाद दावे और आपत्तियां दर्ज की जा सकती हैं। जांच के बाद पात्र मतदाताओं के नाम जोड़े जा सकते हैं और गलत प्रविष्टियों को सुधारा जा सकता है।
इसलिए 13 करोड़ से अधिक नामों का आंकड़ा महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे समझने के लिए हटाए गए नामों की श्रेणी, राज्यवार स्थिति और अंतिम मतदाता सूची में हुए बदलावों को भी देखना होगा।
सितंबर 2026 में प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, महाराष्ट्र और कर्नाटक में नामों की संख्या में बड़ी गिरावट दर्ज की गई, जबकि दिल्ली में मतदाताओं के अनुपात के हिसाब से सबसे ज्यादा कटौती सामने आई।
SIR से जुड़ा विवाद केवल नाम हटने तक सीमित नहीं है। मतदाता सूची में नए नाम जुड़वाने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में किए गए बदलाव भी सवालों के घेरे में हैं।
फॉर्म 6 का इस्तेमाल उन भारतीय नागरिकों की ओर से किया जाता है, जो पहली बार मतदाता के रूप में पंजीकरण कराना चाहते हैं या जिनका नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं है और वे पात्रता की शर्तें पूरी करते हैं।
विवाद तब बढ़ा, जब इस फॉर्म के साथ SIR से जुड़ी एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई। इसमें आवेदक को यह बताना था कि उसका या उसके माता-पिता का नाम पिछली SIR मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं। इस बदलाव को लेकर सवाल उठे कि क्या सामान्य मतदाता पंजीकरण के फॉर्म में इस तरह की अतिरिक्त शर्त जोड़ने की उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाई गई थी।
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के दो आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से संबंधित आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर पिछले 10 महीनों में 14 बार औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई थी। इस रिपोर्ट के बाद आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया पर भी बहस शुरू हुई।
30 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने उन राज्यों में ऑनलाइन फॉर्म 6 से SIR से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा हटा दी, जहां पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। इससे उन राज्यों में सामान्य मतदाता पंजीकरण के लिए निर्धारित फॉर्म का इस्तेमाल फिर से शुरू हुआ।
वहीं, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने Form 6 के संशोधित प्रारूप को न तो मंजूरी दी है और न ही खारिज किया है। अदालत ने यह भी कहा कि मई 2026 में बिहार SIR से जुड़े फैसले के समय यह नया फॉर्म अस्तित्व में नहीं था। इसलिए उस पुराने फैसले को नए फॉर्म की वैधता पर अदालत की सहमति नहीं माना जा सकता।
इस मामले में अदालत के सामने यह सवाल भी है कि फॉर्म में बदलाव किसने किया और इसके लिए किस प्रक्रिया का पालन हुआ। मामले की अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को निर्धारित है।
चुनाव आयोग ने 13.39 करोड़ नामों को गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं की संख्या बताने पर आपत्ति जताई है। आयोग के मुताबिक, एसआईआर के दौरान इन नामों को ASDD श्रेणी में रखा गया। ASDD का अर्थ है-अनुपस्थित (अब्सेंट), स्थायी रूप से दूसरी जगह जा चुके (शिफ्टेड), मृत (डेड) और दोहराए गए नाम (डुप्लीकेट)। आयोग का कहना है कि इन श्रेणियों के आधार पर मतदाता सूची की जांच की गई है और पात्र नागरिक नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं।
फॉर्म 6 को लेकर चुनाव आयोग ने 24 सितंबर को कहा था कि मूल फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया गया है। आयोग के अनुसार, SIR से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा को पुराने फॉर्म में संशोधन करने के बजाय उसके साथ अलग से जोड़ा गया था। इस घोषणा में आवेदकों से पूछा जा रहा था कि उनका या उनके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं।
हालांकि, इस सफाई के बावजूद विवाद खत्म नहीं हुआ। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कथित तौर पर इस बदलाव की वैधता पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि निर्धारित नियमों में बदलाव किए बिना इस तरह की अतिरिक्त शर्त लागू करना उचित नहीं था। इसके बाद 30 सितंबर को आयोग ने उन राज्यों में ऑनलाइन फॉर्म 6 से SIR से जुड़ी अतिरिक्त घोषणा हटा दी, जहां पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी।
SIR को लेकर विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और मतदाताओं के अधिकारों पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का कहना है कि बड़े पैमाने पर नाम हटाने से ऐसे नागरिकों को भी नुकसान हो सकता है, जो वोट देने के पात्र हैं।
विपक्ष सवाल उठा रहा है कि क्या सभी नामों को हटाने से पहले पर्याप्त सत्यापन किया गया? अगर कोई मतदाता घर पर नहीं मिलता या दूसरी जगह चला गया है, तो उसके मामले की जांच किस तरह की गई?
इसके अलावा विपक्ष फॉर्म 6 में अतिरिक्त घोषणा और पिछली मतदाता सूची से जुड़ी जानकारी की जरूरत पर सवाल उठा रहा है। विपक्ष चाहता है कि नाम हटाने के कारणों, संबंधित रिकॉर्ड और फैसले लेने की प्रक्रिया की जानकारी सार्वजनिक हो।
इसको लेकर, 12 अक्टूबर 2026 को राहुल गांधी समेत विपक्षी INDIA गठबंधन के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर SIR की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। इसमें विपक्ष ने मतदाता सूची की स्वतंत्र जांच, नाम हटाने के फैसलों का रिकॉर्ड सार्वजनिक करने और प्रभावित मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने की व्यवस्था की मांग की।
अगर आपका नाम SIR में नहीं मिलता, तो सबसे पहले यह जांचना जरूरी है कि नाम क्यों छूटा है। केवल मसौदा सूची में नाम न मिलने का अर्थ यह नहीं है कि उसे दोबारा जुड़वाने का कोई रास्ता नहीं है।
हालांकि, मतदान के दिन वोट डालने के लिए संबंधित निर्वाचन क्षेत्र की लागू मतदाता सूची में नाम दर्ज होना जरूरी है। सिर्फ वोटर आईडी कार्ड होना अपने आप में मतदान की गारंटी नहीं है।
चुनाव आयोग के नागरिक सेवा पोर्टल पर SIR 2026 से जुड़ी सेवाएं, पिछली SIR सूची में नाम खोजने का विकल्प और नए मतदाता के पंजीकरण के लिए फॉर्म 6 उपलब्ध हैं।
ध्यान दें- फॉर्म 6 भरने से नाम अपने आप मतदाता सूची में दर्ज नहीं हो जाता। आवेदन की जांच और स्वीकृति जरूरी है। यदि चुनाव नजदीक है, तो संबंधित राज्य के निर्वाचन कार्यालय की समयसीमा जरूर जांचें।
निष्कर्ष: SIR को लेकर विवाद केवल मतदाता सूची से 13 करोड़ से ज्यादा नाम हटने तक सीमित नहीं है। असली सवाल यह है कि इनमें कितने नाम मृत, दूसरी जगह जा चुके या दोहरी प्रविष्टि वाले मतदाताओं के थे और कितने पात्र नागरिकों के नाम गलती से छूट गए। चुनाव आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया का उद्देश्य मतदाता सूची को सही बनाना है, जबकि विपक्ष पारदर्शिता और योग्य मतदाताओं के अधिकारों को लेकर सवाल उठा रहा है।
Form 6 में अतिरिक्त घोषणा को लेकर उठे सवालों ने भी इस प्रक्रिया की कानूनी वैधता और नियमों के पालन पर बहस तेज की है। ऐसे में जरूरी है कि चुनाव आयोग नाम हटाने के कारणों और किन-किन लोगों के नाम हटाए गए, इसकी स्पष्ट जानकारी दे, शिकायतों का समय पर निपटारा करे और पात्र मतदाताओं को सूची में नाम जुड़वाने का आसान अवसर मिले।
Source- Election Commission Of India, The Indian Express, ANI, IANS