नीमच

नीमच में वन विभाग की आपत्ति में उलझी 16 करोड़ की गंगा बावड़ी बांध परियोजना

6 वर्षों से अधूरा पड़ा 90 प्रतिशत निर्मित बांध, 14 हेक्टेयर निजी भूमि अधिग्रहित, 10 करोड़ मुआवजा वितरित, 41 हेक्टेयर वन भूमि जलमग्न होने से रुका कार्य, 400 मीटर लम्बी बनी दीवार, अबतक नाला निर्माण कार्य भी शेष।

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Jun 11, 2026
Neemuch Breaking News
400 मीटर लम्बी बनी दीवार

नीमच. मनासा तहसील के पड़दा क्षेत्र की बहुप्रतीक्षित गंगा बावड़ी बांध परियोजना पिछले छह वर्षों से वन विभाग की आपत्तियों के कारण अधर में लटकी हुई है। किसानों को सिंचाई सुविधा, पेयजल उपलब्धता तथा भू-जल स्तर में वृद्धि का सपना दिखाने वाली यह महत्वाकांक्षी परियोजना लगभग 90 प्रतिशत पूर्ण होने के बावजूद अंतिम चरण में अटकी हुई है। जल संसाधन विभाग से प्राप्त जानकारी के अनुसार परियोजना का निर्माण कार्य वर्ष 2017 में प्रारंभ हुआ था और दो वर्षों तक लगातार चलता रहा। वर्ष 2019 में केंद्रीय वन विभाग द्वारा आपत्ति दर्ज किए जाने के बाद निर्माण कार्य पूरी तरह बंद कर दिया गया। तब से लेकर आज तक परियोजना का शेष 10 प्रतिशत कार्य पूरा नहीं हो सका है। बांध पूर्ण होने के बाद लगभग 55 हेक्टेयर क्षेत्रफल में जलभराव होगा। यह जलाशय क्षेत्र की सिंचाई, पेयजल व्यवस्था और भू-जल पुनर्भरण के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

सरकारी आंकड़ों में परियोजना
कुल लागत-16 करोड़ रुपए, निर्माण प्रारंभ-वर्ष 2017, कार्य बंद- वर्ष 2019,पूर्ण कार्य- लगभग 90 प्रतिशत, अधिग्रहित निजी भूमि- 14 हेक्टेयर, वितरित मुआवजा- करीब 10 करोड़ रुपए, प्रभावित वन भूमि- 41 हेक्टेयर, प्रस्तावित सिंचाई क्षेत्र- 575 हेक्टेयर, जलभराव क्षेत्र-लगभग 55 हेक्टेयर, लाभान्वित गांव - गंगा बावड़ी, सांड बावड़ी, रावतपुरा, सुंडी सहित अनेक गांव

575 हेक्टेयर कृषि भूमि को मिलना था सिंचाई लाभ
गंगा बावड़ी बांध की परिकल्पना पहली बार वर्ष 2004 में की गई थी तथा फरवरी 2005 में इसका भूमिपूजन हुआ था। प्रारंभिक चरण में लागत वृद्धि और वन भूमि संबंधी तकनीकी अड़चनों के कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। बाद में सिंचाई प्रस्ताव में संशोधन कर योजना को पुन: स्वीकृति मिली और निर्माण कार्य शुरू किया गया। उक्त परियोजना पूर्ण होने पर लगभग 575 हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलने का अनुमान है। इससे क्षेत्र में रबी एवं खरीफ दोनों फसलों का उत्पादन बढऩे की उम्मीद है। साथ ही गंगा बावड़ी, सांड बावड़ी, रावतपुरा, सुंडी सहित लगभग 10 किलोमीटर के दायरे में आने वाले कई गांवों के भू-जल स्तर में भी सुधार होना था।

भूमि अधिग्रहित कर बांटा 10 करोड़ का मुआवजा
बांध निर्माण के लिए जल संसाधन विभाग द्वारा आसपास के किसानों की लगभग 14 हेक्टेयर निजी कृषि भूमि अधिग्रहित की गई थी। इसके एवज में विभाग ने करीब 10 करोड़ रुपए का मुआवजा भी प्रभावित किसानों को वितरित कर दिया था। भूमि अधिग्रहण और मुआवजा प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद निर्माण कार्य तेजी से आगे बढ़ा, लेकिन वन भूमि विवाद के कारण परियोजना फिर रुक गई।

41 हेक्टेयर वन भूमि होगी जलमग्न
परियोजना की सबसे बड़ी बाधा वन विभाग की भूमि है। प्रारंभिक सर्वेक्षण में लगभग 36 हेक्टेयर वन भूमि प्रभावित होना दर्शाया गया था, लेकिन पुन: सीमांकन के दौरान यह क्षेत्र बढकऱ 41 हेक्टेयर पाया गया। वन विभाग के अनुसार 40 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि प्रभावित होने के कारण मामले की स्वीकृति और कार्रवाई केंद्रीय स्तर पर की जानी आवश्यक है। इसी कारण केंद्रीय वन विभाग की ओर से आपत्ति दर्ज की गई और निर्माण कार्य पर रोक लग गई।

90 प्रतिशत कार्य पूर्ण, वन भूमि क्षतिपूर्ति से बढ़ेगी लागत
गंगा बावड़ी बांध की कुल लागत लगभग 16 करोड़ रुपए निर्धारित की गई थी। वर्तमान में परियोजना का करीब 90 प्रतिशत निर्माण कार्य पूर्ण हो चुका है। लगभग 450 मीटर लंबी बांध दीवार का निर्माण पूरा हो चुका है। केवल दोनों ओर निर्मित दीवारों को जोडऩे वाले मध्य नाले के हिस्से का निर्माण शेष है। यह कार्य पूरा होते ही बांध में जल भराव शुरू हो सकता है। वहीं वन विभाग की आपत्ति का समाधान होने के बाद, जल संसाधन विभाग को प्रभावित वन भूमि के बदले लगभग 25 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से भुगतान भी करना होगा। इससे परियोजना की कुल लागत में उल्लेखनीय वृद्धि होने की संभावना है।

27 पंचायतों को मिलना था पेयजल लाभ
गंगा बावड़ी बांध परियोजना से प्रारंभिक रूप से 27 ग्राम पंचायतों को पेयजल उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई थी। बाद में इन पंचायतों को चंबलेश्वर बांध, कंजार्डा से जोड़ दिया गया, लेकिन सरकारी अभिलेखों में यह परियोजना आज भी गंगा बावड़ी बांध योजना के नाम से संचालित है। जबकि वास्तविक स्थिति यह है कि बांध का निर्माण आज भी अधूरा पड़ा हुआ है।

इनका कहना है
एसडीओ जल संसाधन विभाग नीमच हिमांशु भाभोर ने बताया कि गंगा बावड़ी बांध परियोजना का निर्माण वर्ष 2017 में शुरू हुआ था। वर्ष 2019 में केंद्रीय वन विभाग की आपत्ति के कारण कार्य रोकना पड़ा। मामले के समाधान के प्रयास जारी हैं और उम्मीद है कि जल्द ही शेष 10 प्रतिशत कार्य पूरा कर परियोजना को पूर्ण किया जाएगा।

Published on:
11 Jun 2026 11:43 am