नई दिल्ली

‘रुक-रुक कर हो रहे हैं युद्ध’, सेना प्रमुख ने बताया क्यों बदलनी होगी भारत की सैन्य रणनीति

Indian Army: जनरल धीरज सेठ ने कहा कि बदलती तकनीक के दौर में सिर्फ नए हथियार बनाना पर्याप्त नहीं है। जरूरी है कि सेना में शामिल होने तक तकनीक आधुनिक और उपयोगी बनी रहे। उन्होंने कहा कि भविष्य की सैन्य क्षमता में सैनिक को केंद्र में रखना होगा और आत्मनिर्भरता देश को युद्ध के दौरान अपनी जरूरतों के लिए स्वतंत्र बनाती है।
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Army Chief General Dheeraj Seth
थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ (फोटो सोर्स- IANS)

Army Chief General:थल सेनाध्यक्ष जनरल धीरज सेठ ने कहा है कि आज युद्ध का स्वरूप, तकनीक और उसकी अवधि तेजी से बदल रही है। ऐसे में भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता का मतलब सिर्फ देश में हथियार और सैन्य उपकरण बनाना नहीं, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष में अपनी सैन्य ताकत को बनाए रखने और जरूरत के मुताबिक उसे लगातार मजबूत करने की क्षमता विकसित करनी होगी। उन्होंने आज के युद्धों को ‘रुक-रुक कर होने वाले युद्ध’ बताया।

1971 की तरह अब तुरंत खत्म नहीं होते युद्ध

1971 में ढाका में हुए ऐतिहासिक आत्मसमर्पण को याद करते हुए सेना प्रमुख ने कहा कि पिछली सदी के युद्धों का एक साफ अंत होता था, जहां जीत और हार का क्षण स्पष्ट दिखता था। लेकिन आज के 'रुक-रुक कर होने वाले युद्धों' में ऐसा नहीं है। तकनीक भले ही झड़पों की अवधि कम कर दे, लेकिन युद्धों का खिंचाव लंबा हो सकता है।

सस्ती तकनीक का बड़ा खतरा और आधुनिक चुनौतियां

आधुनिक सैन्य चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुए सेना प्रमुख ने स्पष्ट किया कि आज के दौर में तकनीक बहुत तेजी से बदल रही है। महज कुछ सौ डॉलर का एक छोटा ड्रोन, लाखों-करोड़ों डॉलर के बड़े सैन्य प्लेटफार्म और टैंकों को आसानी से तबाह कर सकता है। सैन्य हथियारों को विकसित करने और उन्हें सेना में शामिल करने में सालों का वक्त लगता है, जबकि तकनीक कुछ ही महीनों में बदल जाती है। ऐसे में सबसे बड़ी चुनौती ऐसे हथियार और उपकरण तैयार करने की है, जो सेना के उपयोग में आने तक अप्रचलित न हो जाएं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि जो तकनीक हमारे पास है, वही दुश्मन के पास भी हो सकती है। इसलिए असली बढ़त इस बात से तय होगी कि हम दुश्मन की काट कितनी तेजी से खोजते हैं और खुद को बदलते हैं।

पुरानी तोपें भी नई तकनीक से बन सकती हैं असरदार

सेनाध्यक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि नई तकनीक के आने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पुरानी सैन्य प्रणालियों को कबाड़ मान लिया जाए। अगर दशकों पुरानी एयर डिफेंस तोपों को आधुनिक सेंसर और फायर कंट्रोल सिस्टम से जोड़ दिया जाए, तो वे ड्रोन और ड्रोन-हमलों का मुकाबला करने में बेहद कारगर साबित हो सकती हैं। भारतीय सेना की भविष्य की रणनीति पुराने और भरोसेमंद हथियारों को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर एक बेहतरीन संतुलन बनाने की है।

जमीन पर कब्जा सैनिक ही दिला सकता है

भारतीय सेना को शून्य से नीचे के तापमान से लेकर भीषण गर्मी तक और समंदर से लेकर अत्यधिक ऊंचाई वाले पहाड़ों तक तैनात रहना पड़ता है। इसलिए हर परिस्थिति के लिए एक ही समाधान काम नहीं आ सकता। सेना प्रमुख ने कहा कि लंबी दूरी की मिसाइलें युद्ध का माहौल तो बना सकती हैं, लेकिन जमीन पर कब्जा करने और उसकी सुरक्षा करने का काम अंततः सैनिक ही करता है। जमीन पर नियंत्रण ही सफलता का एकमात्र प्रत्यक्ष प्रमाण है, इसलिए आत्मनिर्भरता से जुड़े हर फैसले के केंद्र में हमेशा सैनिक और योद्धा होना चाहिए।

'समर्थ' भारत और स्वदेशी रक्षा उत्पादन की छलांग

इन सभी चुनौतियों से निपटने के लिए थल सेनाध्यक्ष ने भविष्य के लिए 'समर्थ' की अवधारणा पेश की। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भरता हमें लड़ने की आजादी देती है, क्षमता हमें सामर्थ्य देती है और सैनिक की इच्छाशक्ति हमें जीत दिलाती है। आज भारत के रक्षा उत्पाद दुनिया के 80 से अधिक देशों तक पहुंच रहे हैं। भारतीय सेना के इस्तेमाल में आने वाले 175 में से 159 प्रकार के गोला-बारूद का निर्माण अब पूरी तरह स्वदेशी हो चुका है। इस पूरे रक्षा ढाँचे को मजबूत करने में देश के लगभग 16,000 सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSMEs) अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

Updated on:
27 Sept 2026 02:15 pm
Published on:
27 Sept 2026 02:13 pm