
देवेंद्रकुल वेल्लालर
Devendrakula Vellalar: भारत में जहां ज्यादातर जातियां और समुदाय आरक्षण (Reservation) के दायरे में आने या और अधिक पिछड़ा घोषित होने के लिए सड़कों पर उतरते हैं, वहीं तमिलनाडु से एक हैरान कर देने वाली खबर आ रही है। तमिलनाडु का देवेंद्रकुल वेल्लालर (DKV) समुदाय अनुसूचित जाति (SC) की सूची से बाहर होना चाहता है। यह समाज न सिर्फ आरक्षण के लाभ छोड़ना चाहता है, बल्कि इसने कड़े SC/ST (अत्याचार निवारण) कानून का इस्तेमाल न करने का भी बड़ा फैसला लिया है। विकास की ओर बढ़ते भारत में यह पहल अनोखी मानी जा रही है।
हाल ही में IIT बॉम्बे में एक छात्र की आत्महत्या के बाद एक प्रोफेसर पर SC/ST एक्ट के तहत मामला दर्ज हुआ था। इसके विरोध में एनआईटी तिरुचिरापल्ली से पढ़े और अमेरिका की टेक कंपनी इंटेल में काम कर चुके अनंथन अय्यासामी ने सोशल मीडिया पर अपनी बात रखी। तमिलनाडु के तेनकासी से ताल्लुक रखने वाले अय्यासामी ने साफ कहा कि उनका समाज देवेंद्रकुल वेल्लालर किसी भी सूरत में इस कानून का दुरुपयोग हथियार की तरह करने के खिलाफ है। अय्यासामी और उनके समाज का मानना है कि ऐसे कठोर कानूनों का गलत इस्तेमाल आपस में दुश्मनी और नफरत को बढ़ाता है। इस विचार का समर्थन जोहो (Zoho) के संस्थापक श्रीधर वेम्बू और वरिष्ठ पत्रकारों ने भी किया है।
देवेंद्रकुल वेल्लालर (DKV) समाज के नेताओं का कहना है कि उन्होंने सैद्धांतिक रूप से यह फैसला किया है कि वे किसी के खिलाफ SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम या 1955 के नागरिक अधिकार संरक्षण (PCR) अधिनियम के तहत मामले दर्ज नहीं कराएंगे। उनका मानना है कि इस तरह के कानूनों के लगातार इस्तेमाल से ज़मीनी स्तर पर सामाजिक ताना-बाना बिगड़ता है और आपसी भाईचारा भी खत्म होता है।
दक्षिण भारत के तमिलनाडु में DKV समाज की आबादी लगभग 5 से 9 प्रतिशत के करीब है। मुख्य रूप से यह खेती-किसानी से जुड़ा समुदाय है, जो मदुरै, रामनाथपुरम, तिरुनेलवेली और तूतीकोरिन जैसे इलाकों में फैला हुआ है। साल 2021 में केंद्र सरकार ने पल्लर समेत सात उप-जातियों को मिलाकर 'देवेंद्रकुल वेल्लालर' नाम को आधिकारिक मंजूरी दी थी। इसमें 'देवेंद्र' का संबंध देवताओं के राजा इंद्र के वंशज होने की पौराणिक मान्यता से है, जबकि 'वेल्लालर' का सीधा अर्थ कृषि और भूमि से जुड़ा होना है।
इस समाज के नेताओं, जैसे पुथिया तमिझगम के अध्यक्ष डॉ. के. कृष्णासामी का कहना है कि वे यह कदम अमीर होने के लिए नहीं, बल्कि अपने आत्मसम्मान के लिए उठा रहे हैं। उनका कहना है कि दशकों तक SC श्रेणी में रहने के बावजूद समाज से पिछड़ा होने का ठप्पा नहीं हट पाया। इस वजह से जब समाज के लोग व्यापार या होटल-रेस्टोरेंट शुरू करते हैं, तो लोग जाति के कारण उनके पास जाने से झिझकते हैं। आरक्षण से कुछ सरकारी नौकरियां तो मिलीं, लेकिन समाज का बिजनेस में आगे बढ़ना और बराबरी का दर्जा पाना मुश्किल हो गया।
DKV समाज के नेताओं का यह कदम सीधे एक बार में आरक्षण छोड़ने का नहीं है, बल्कि यह एक सोच-समझकर बनाई गई चरणबद्ध योजना है। सबसे पहले समाज चाहता है कि केंद्र और राज्य सरकारें उन्हें SC श्रेणी से निकालकर OBC (अन्य पिछड़ा वर्ग) में शामिल करें। इसके बाद OBC श्रेणी में लगभग 10 से 15 साल रहकर जब समाज व्यापार, शिक्षा और सामाजिक रूप से पूरी तरह मजबूत हो जाएगा, तो उनका अंतिम लक्ष्य सामान्य श्रेणी (General Category) में शामिल होना है।
तमिलनाडु के राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार, DKV समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग इस मांग के साथ मजबूती से खड़ा है क्योंकि वे अपनी पुरानी और समृद्ध सांस्कृतिक पहचान वापस पाना चाहते हैं। हालांकि, समाज का एक छोटा हिस्सा विशेषकर वे लोग जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया है इस कदम का विरोध कर रहे हैं और आरक्षण के लाभ आगे भी जारी रखना चाहते हैं।
1950 में जब देश की पहली अनुसूचित जाति की सूची बनी थी, तब उसमें 607 जातियां शामिल थी, जो आज बढ़कर 1,200 से अधिक हो चुकी हैं। आज के दौर में लगभग हर समाज किसी न किसी तरह से पिछड़ेपन का दर्जा मांग रहा है। ऐसे समय में, देवेंद्रकुल वेल्लालर समाज का अपने आत्मसम्मान के दम पर ऊपर उठने और आरक्षण का टैग हटाने की मांग करना स्वतंत्र भारत के इतिहास में एक अनूठी मिसाल है।
Updated on:
27 Sept 2026 12:07 pm
Published on:
27 Sept 2026 11:47 am
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