Arvind Kejriwal: दिल्ली शराब नीति मामले में हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के हालिया फैसले पर अरविंद केजरीवाल ने अपनी पहली टिप्पणी की है। जानें क्या बोले।
Justice Swarana Kanta Sharma: दिल्ली शराब नीति मामले में हाई कोर्ट की जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के फैसले पर आप संयोजक अरविंद केजरीवाल का पहला बयान सामने आया है। चेन्नई में चुनावी दौरे पर मौजूद केजरीवाल ने कहा कि वह दिल्ली लौटकर कोर्ट के आदेश का विस्तृत अध्ययन करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे अपनी बात पहले ही अदालत के समक्ष रख चुके हैं और फिलहाल इससे अधिक कुछ नहीं कहना चाहते। इस दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के काम की सराहना करते हुए परिसीमन के मुद्दे पर केंद्र को घेरते हुए इसे लोकतंत्र पर प्रहार बताया।
इसके अलावा अरविंद केजरीवाल ने कहा, हम सभी परिसीमन विधेयक का विरोध करने में एकजुट हैं, क्योंकि यह लोकतंत्र पर हमला है और हम इसका कड़ा विरोध करते हैं। दक्षिणी राज्यों के साथ भेदभाव होगा। मेरा मानना है कि एमके स्टालिन (सीएम तमिलनाडु) बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, और जो भी अच्छा काम कर रहा है, उसका समर्थन किया जाना चाहिए। बीजेपी को ज्यादा महत्व मत दीजिए। तमिलनाडु में बीजेपी की कोई मौजूदगी नहीं है।
दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने आबकारी नीति मामले से जुड़ी अरविंद केजरीवाल और अन्य की याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस शर्मा ने स्वयं को इस मामले की सुनवाई से अलग करने की मांग को भी सिरे से नकार दिया। इस फैसले का स्वागत करते हुए मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने इसे न्यायपालिका की जीत बताया। उन्होंने कहा कि यह आदेश साफ संदेश देता है कि अदालतों की निष्पक्षता और गरिमा सर्वोपरि है। सीएम ने केजरीवाल पर निशाना साधते हुए कहा कि न्यायिक प्रक्रिया पर सवाल उठाना और मौजूदा न्यायाधीश की शुचिता पर लांछन लगाना लोकतांत्रिक संस्थानों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है।
उन्होंने एक बयान में कहा कि जब उच्च सार्वजनिक पदों पर आसीन व्यक्ति इस तरह का आचरण करते हैं, तो इससे न्याय व्यवस्था में जनता का विश्वास कम होने का खतरा होता है। भ्रष्टाचार और नियमों के उल्लंघन के आरोपों से जुड़े आबकारी नीति मामले में केजरीवाल कई आरोपियों में से एक हैं।
अरविंद केजरीवाल ने आरोप लगाया था कि जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के बच्चे सरकारी पैनल में हैं, इसलिए यह 'हितों के टकराव' का मामला है। इसे खारिज करते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा कि बिना किसी ठोस सबूत के सिर्फ इस आधार पर जज के बच्चों को उनके मौलिक अधिकार कानूनी प्रैक्टिस से नहीं रोका जा सकता। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, यदि राजनेताओं के बच्चे राजनीति में आ सकते हैं, तो जजों के बच्चों के वकालत करने पर सवाल उठाना अनुचित है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल सरकारी पैनल में होने से फैसले की निष्पक्षता प्रभावित नहीं होती।