नई दिल्ली

‘वोट चोरी’ और ‘अदृश्य हाथ’ का आरोप, असहमति की रिपोर्ट के बाद कांग्रेस का चुनाव आयोग पर हमला

Election Commission: कांग्रेस ने चुनाव आयोग के भीतर कथित असहमति की रिपोर्ट को लेकर ECI पर सवाल उठाए हैं। राहुल गांधी ने ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया, जबकि मनीष तिवारी ने ‘अदृश्य हाथ’ की भूमिका की बात कही।
4 min read
rahul gandhi on Election Commission
असहमति की रिपोर्ट के बाद कांग्रेस का चुनाव आयोग पर हमला, फोटो सोर्स- ANI

Election Commission Dissent:चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर सामने आई एक रिपोर्ट के बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने निर्वाचन आयोग पर सवाल उठाए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्ति दर्ज की। दोनों ने कथित तौर पर कुछ फैसलों को अपनी जानकारी या मंजूरी के बिना लिए जाने पर सवाल उठाए।

रिपोर्ट के मुताबिक, ये आपत्तियां मतदाता सूची में नए नाम जोड़ने, मतदाताओं के नाम हटाने और बहाल करने, फॉर्म-6 में बदलाव, चुनावी डेटा की सुरक्षा और मतदाता डेटाबेस के संचालन जैसे मुद्दों से जुड़ी थीं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस के धीरे-धीरे दिल्ली में केंद्रीकृत होने को लेकर चिंता जताई थी।

राहुल गांधी ने लगाया ‘वोट चोरी’ का आरोप

कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने इस रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग पर तीखा हमला बोला। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि ‘वोट चोरी’ भारतीय लोगों के खिलाफ अपराध और संविधान पर सीधा हमला है। राहुल गांधी ने इसके लिए बीजेपी, आरएसएस और चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हुए कहा कि न्याय होगा। राहुल गांधी ने एक वीडियो भी साझा किया। इसमें वह चुनाव आयोग और उसके अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहते नजर आए कि जो किया जा रहा है वह गलत है। उन्होंने आगे कहा कि उनका समय आएगा और वे इससे बच नहीं सकते।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल पहले से ही चुनाव आयोग की Special Intensive Revision (SIR) प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में ऐसे लोगों के नाम हट सकते हैं जो मतदान के पात्र हैं। चुनाव आयोग इन राजनीतिक आरोपों को खारिज करता रहा है।

मनीष तिवारी बोले- ‘अदृश्य हाथ’ की भूमिका का संकेत

कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने भी इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट का हवाला देते हुए चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अगर रिपोर्ट में बताए गए तथ्य सही हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि चुनाव आयोग के कामकाज के पीछे कोई ‘अदृश्य हाथ’ हो सकता है। तिवारी ने कहा कि यदि नियमों का पालन नहीं हुआ और ऐसे फैसले लिए गए जो सर्वसम्मत या बहुमत से मंजूर नहीं थे, तो उन फैसलों की वैधता पर सवाल खड़े होते हैं। हालांकि, ‘अदृश्य हाथ’ संबंधी टिप्पणी तिवारी का राजनीतिक आरोप है, कोई स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य नहीं।

डेरेक ओ'ब्रायन ने CEC के खिलाफ महाभियोग की मांग दोहराई

तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने भी इस मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने से जुड़े राज्यसभा प्रस्ताव का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाने का समय है। ओ'ब्रायन ने सोशल मीडिया पोस्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई की मांग की। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि इससे पहले 60 से अधिक राज्यसभा सांसदों ने सभापति से ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए प्रस्ताव लाने की मांग की थी।

क्या है चुनाव आयोग के भीतर आपत्तियों का मामला?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों के दौरान कम से कम 14 बार आपत्ति दर्ज की। इनमें से चार आपत्तियां एक ही दिन दर्ज की गईं। रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों ने कुछ ऐसे आदेशों और फैसलों पर सवाल उठाए जिनके बारे में उनका कहना था कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी।

रिपोर्ट में फॉर्म-6 का मामला भी शामिल है। यह फॉर्म नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होता है। रिपोर्ट के मुताबिक, जुलाई 2026 में इसमें ऐसा सवाल जोड़ा गया जिसमें आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि वह या उसके माता-पिता/दादा-दादी पिछली SIR वाली मतदाता सूची में मौजूद थे या नहीं। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर सवाल उठाते हुए कहा था कि वैधानिक फॉर्म में बदलाव के लिए संबंधित नियमों में संशोधन जरूरी है। संधू ने भी इस पर सहमति जताई थी। बाद में संधू ने इस बदलाव को ‘अनधिकृत और अवैध’ बताते हुए इसे हटाने की बात कही थी।

मतदाता डेटाबेस को लेकर भी उठे सवाल

रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने मतदाता सूची के डेटाबेस तक राज्य स्तर के अधिकारियों की पहुंच को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कथित तौर पर कहा कि मतदाता डेटा का संचालन धीरे-धीरे दिल्ली में केंद्रीकृत हो रहा है। एक अन्य मामले में दोनों चुनाव आयुक्तों ने चुनावी डेटा के आईटी ढांचे से जुड़े काम के बंटवारे को लेकर अलग-अलग पत्र कैबिनेट सचिव को लिखे। रिपोर्ट में कहा गया है कि उन्हें आशंका थी कि इससे मतदाता डेटाबेस की निगरानी और नियंत्रण से जुड़ी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।

रिपोर्ट में गोवा का एक मामला भी सामने आया है। इसमें 97 मतदाताओं के नाम से जुड़े मामलों में स्थानीय चुनाव अधिकारियों द्वारा पात्र पाए जाने के बावजूद सॉफ्टवेयर में उनके फैसले दर्ज नहीं हो पाने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के अधिकारियों ने इस समस्या को दूर करने के लिए कई बार अनुरोध किया था।

चुनाव आयोग ने कहा- SIR के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए

वहीं, चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों ने इन रिपोर्टों के बाद कहा है कि SIR समेत आयोग के सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से सर्वसम्मति से लिए गए हैं। आयोग के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से अलग-अलग मुद्दों पर सवाल या आपत्तियां दर्ज किया जाना आंतरिक विचार-विमर्श का हिस्सा हो सकता है, लेकिन अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए। चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संवैधानिक संस्था है, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त शामिल होते हैं। मौजूदा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब SIR को लेकर पहले से ही सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक बहस जारी है।

इस रिपोर्ट के बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और उसकी स्वतंत्रता पर नए सवाल उठाए हैं, जबकि आयोग ने अपने फैसलों को सर्वसम्मत बताते हुए अंदरूनी मतभेदों की खबरों के राजनीतिक अर्थ निकाले जाने को खारिज किया है।

Updated on:
23 Sept 2026 02:10 pm
Published on:
23 Sept 2026 02:09 pm