
AI Investment India:स्वतंत्रता दिवस पर जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित किया, तो उन्होंने भारत के भविष्य की एक बेहद नई और आधुनिक तस्वीर पेश की। पीएम मोदी ने साफ कहा कि आने वाला दौर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), कंप्यूटर चिप्स और बड़े-बड़े डेटा सेंटरों का है। देश की युवा आबादी को इस नई टेक-क्रांति के लिए तैयार करने के मकसद से सरकार का लक्ष्य करीब 1 करोड़ युवाओं को AI की खास ट्रेनिंग देना है।
लेकिन इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने एक बेहद गंभीर और जमीनी चुनौती की तरफ भी ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि इन हाई-टेक तकनीकों को चौबीसों घंटे चलाने के लिए देश को बहुत भारी मात्रा में बिजली और ऊर्जा की आवश्यकता होगी। बिना पर्याप्त ऊर्जा के इस नए 'डिजिटल इंडिया' का सपना पूरा होना नामुमकिन है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, भारत में डेटा सेंटरों की क्षमता 2020 के मुकाबले अब चार गुना से भी ज्यादा बढ़ चुकी है। मुंबई, दिल्ली-एनसीआर और बेंगलुरु जैसे बड़े टेक-हब के बाद अब मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी डेटा सेंटर स्थापित करने की तेजी से तैयारी चल रही है।
एक तरफ जहां देश को हाई-टेक बनाकर सुपरपावर बनाने की कोशिश हो रही है, वहीं दूसरी तरफ आम लोगों के मन में अपनी बुनियादी जरूरतों को लेकर डर बैठने लगा है। अमरीका और यूरोप की तर्ज पर अब भारत के शहरों में भी विशाल डेटा सेंटरों के खिलाफ स्थानीय लोगों का विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है।
महाराष्ट्र के ठाणे में अमेजॅन के डेटा सेंटर प्रोजेक्ट का स्थानीय निवासी खुलकर विरोध कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि उनके शहर में पहले से ही पीने के पानी की भारी किल्लत है और वे टैंकरों के भरोसे दिन काट रहे हैं। ऐसे में रिहायशी इलाकों के बीच भारी मात्रा में पानी और बिजली की खपत करने वाले डेटा सेंटर बनाने से आम जनता की मुश्किलें और बढ़ जाएगी।
ठीक ऐसा ही माहौल आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम (विजाग) में भी देखने को मिल रहा है। वहां गूगल और अडानी समूह के प्रस्तावित विशाल AI डेटा सेंटर कॉम्प्लेक्स का नागरिक समूह और पर्यावरणप्रेमी विरोध कर रहे हैं। स्थानीय लोगों को डर है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट से वहां के जंगलों, वन्यजीव अभयारण्य और पहले से ही किल्लत से जूझ रहे जलस्रोतों पर बहुत बुरा असर पड़ेगा।
यह पूरी स्थिति देश के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि क्या भारत अपनी बुनियादी जरूरतों यानी पानी और बिजली का संतुलन बनाए रखते हुए इस डिजिटल दौर में आगे बढ़ पाएगा?