
Sheikh Abubakr Ahmed: केरल के ग्रैंड मुफ्ती शेख अबूबकर अहमद के महिलाओं को घर की चारदीवारी तक सीमित रखने वाले बयान पर देश में तीखी बहस शुरू हो गई है। कोच्चि में आयोजित एक धार्मिक सम्मेलन में उन्होंने कहा कि महिलाओं को घर में रहना चाहिए और सार्वजनिक जीवन में नहीं आना चाहिए। उन्होंने महिलाओं की तुलना सोने के आभूषण से करते हुए कहा कि जिस तरह सोने के हार को उसकी सुंदरता और कीमत सुरक्षित रखने के लिए डिब्बे में रखा जाता है, उसी तरह महिलाओं को भी घर में रहना चाहिए।
इस बयान पर मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की राष्ट्रीय संयोजक और महिला प्रकोष्ठ की प्रमुख डॉ. शालिनी अली ने कड़ा विरोध जताया है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को सम्मान के नाम पर घर में बंद करना सम्मान नहीं, बल्कि उनकी स्वतंत्रता और क्षमता पर पहरा लगाना है। उनके अनुसार, जिस देश की बेटियां सेना के तीनों अंगों में देश की रक्षा कर रही हैं और वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, अर्थशास्त्री, शिक्षाविद, पत्रकार, पायलट और खिलाड़ी बनकर अपनी पहचान बना रही हैं, वहां महिलाओं को घर में कैद रहने की सलाह देना आज के भारत की वास्तविकता का अपमान है।
डॉ. शालिनी अली ने इस बयान को बेहद आपत्तिजनक और तानाशाहीपूर्ण सोच का उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि महिला कोई सोने का हार या सजावटी वस्तु नहीं है, जिसे किसी डिब्बे में बंद करके रखा जाए। वह अपने सपनों, प्रतिभा, मेहनत और निर्णय लेने के अधिकार के साथ जीने वाली स्वतंत्र इंसान है। महिलाओं को शिक्षित और आत्मनिर्भर बनाने के बजाय उन्हें घर की चारदीवारी में सीमित रखने की सोच समाज को पीछे ले जाने वाली है। बता दें कि ग्रैंड मुफ्ती ने अपने भाषण में कहा कि महिलाओं को घर में रहना चाहिए और सार्वजनिक जीवन में नहीं आना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि उनका उद्देश्य महिलाओं को नीचा दिखाना नहीं, बल्कि उनका सम्मान और संरक्षण करना है। अपने तर्क को समझाने के लिए ग्रैंड मुफ्ती ने सोने के हार का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि आभूषण की दुकान पर सोने के हार को पहले अलमारी से, फिर डिब्बे से और उसके बाद पैकिंग से निकालकर ग्राहक को दिखाया जाता है। उन्होंने इसकी तुलना सड़क किनारे रखे जाने वाले पत्थर पीसने के उपकरण से की। उनका कहना था कि अगर सोने का हार सड़क पर रख दिया जाए तो आने-जाने वाले लोग उसे छू सकते हैं, जिससे उसकी सुंदरता और कीमत प्रभावित हो सकती है।
डॉ. शालिनी अली की आपत्ति इसी बुनियादी सवाल पर केंद्रित है। उन्होंने कहा कि आज का भारत उस पुराने ढांचे से बहुत आगे निकल चुका है, जिसमें महिला की पूरी पहचान केवल घर और परिवार तक सीमित मानी जाती थी। देश की बेटियां लड़ाकू विमान उड़ा रही हैं, वैज्ञानिक के रूप में काम कर रही हैं, डॉक्टर और इंजीनियर बन रही हैं, विश्वविद्यालयों और अदालतों में जिम्मेदारियां संभाल रही हैं, पत्रकारिता और उद्योग में आगे बढ़ रही हैं और खेल के मैदान में देश का नाम रोशन कर रही हैं। उन्होंने कहा कि महिलाएं देश की सीमाओं की रक्षा कर रही हैं, कठिन वैज्ञानिक परियोजनाओं पर काम कर रही हैं, अस्पतालों में लोगों की जान बचा रही हैं और विश्व मंच पर देश का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। ऐसे समय में महिलाओं को घर के भीतर बंद रखने का विचार केवल उनकी उड़ान रोकने वाला नहीं है, बल्कि देश की आधी आबादी की क्षमता को सीमित करने की कोशिश जैसा है।