
Supreme Court Loan Default: सुप्रीम कोर्ट ने लोन की किस्त नहीं चुकाने पर वाहन जब्त करने के तरीके को लेकर अहम टिप्पणी की है। दरअसल, कोर्ट ने कहा कि बैंक और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियां (NBFC) बकाया वसूलने के लिए जबरन वाहन नहीं उठा सकतीं। इसके लिए तय कानूनी प्रक्रिया और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के दिशा-निर्देशों का पालन करना जरूरी है। अदालत ने कहा कि वित्तीय संस्थानों को कर्ज की वसूली का अधिकार है, लेकिन वे इसके लिए बल या दबाव का इस्तेमाल नहीं कर सकते।
यह मामला उस व्यक्ति से जुड़ा है, जिसने चोलामंडलम इन्वेस्टमेंट एंड फाइनेंस कंपनी से कमर्शियल वाहन के लिए लोन लिया था। लोन की किस्तें नहीं चुकाने पर कंपनी ने उसे नोटिस जारी किया और बाद में ट्रक अपने कब्जे में ले लिया। वाहन मालिक का आरोप था कि उसके खिलाफ उचित प्रक्रिया अपनाए बिना ट्रक जब्त किया गया।
मामले में 9 अप्रैल 2023 की रात करीब एक बजे चार अज्ञात लोगों ने ट्रक का स्टीयरिंग लॉक तोड़ दिया। इसके बाद वे ट्रक को उस समय लेकर चले गए, जब उसमें सामान लदा हुआ था। वाहन मालिक का कहना था कि उसे इसकी जानकारी बाद में हुई और बकाया रकम चुकाने के लिए दबाव बनाया गया।
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने पर पीठ ने 5 मई 2003 को RBI की ओर से जारी Fair Practices Code for Lenders का हवाला दिया। इन दिशा-निर्देशों में कर्ज की वसूली के दौरान जबरदस्ती या परेशान करने वाले तरीकों का इस्तेमाल नहीं करने की बात कही गई है। कोर्ट ने कहा कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों को कर्ज की वसूली के लिए कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए। वे गुंडों या बाहरी लोगों के जरिए वाहन पर कब्जा नहीं कर सकते। अदालत ने 26 फरवरी 2007 के अपने एक पुराने फैसले का भी जिक्र किया, जिसमें कर्ज वसूली के लिए बल प्रयोग या जबरन वाहन कब्जे में लेने के तरीके पर रोक की बात कही गई थी।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने यह भी कहा कि वाहन मालिक को बिक्री से पहले नोटिस दिया जाना चाहिए था। अदालत के मुताबिक, इस मामले में न तो उचित नोटिस दिया गया और न ही वाहन की बिक्री के संबंध में तय प्रक्रिया का पालन किया गया। कोर्ट ने कहा कि वित्तीय संस्थान को अपना पैसा वापस पाने का अधिकार है, लेकिन इसके लिए कर्जदार के साथ निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाना भी जरूरी है। किसी व्यक्ति की संपत्ति को जबरन अपने कब्जे में लेना कानून के मुताबिक नहीं हो सकता।
पीठ ने कहा कि RBI की ओर से जारी दिशा-निर्देश और संबंधित कानून वित्तीय संस्थानों को कर्ज की वसूली के लिए उचित तरीका अपनाने के लिए कहते हैं। कोर्ट ने RBI को भी निर्देश दिया कि वह इन दिशा-निर्देशों और सर्कुलर को प्रभावी तरीके से लागू कराने के लिए जरूरी कदम उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि कर्ज की वसूली के लिए वित्तीय संस्थानों की जरूरत और कर्जदार के निष्पक्ष व्यवहार के अधिकार के बीच संतुलन जरूरी है। अदालत ने कहा कि नोटिस और उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी व्यक्ति की संपत्ति पर कब्जा नहीं किया जा सकता।