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UPI Charges 2026: UPI पर MDR की जंग तेज, राहुल गांधी के ‘अमेरिकी दबाव’ वाले दावे के बीच संसद की रिपोर्ट क्यों चर्चा में?

Rahul Gandhi UPI: UPI शुल्क पर सियासत गरम है, लेकिन कहानी सिर्फ राजनीतिक आरोपों तक सीमित नहीं है। संसदीय रिकॉर्ड में डिजिटल पेमेंट नेटवर्क की बढ़ती लागत और उसके लिए टिकाऊ वित्तीय व्यवस्था पर पहले ही सवाल उठाए जा चुके थे।
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भारत

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Manoj Vashisth

Sep 17, 2026

UPI Charges 2026

UPI Charges 2026 : राहुल गांधी के हमले के बीच सामने आया संसद का रिकॉर्ड, MDR पर पहले ही हो चुकी थी बहस (फोटो सोर्स: ANI/AI@chatgpt))

UPI Payment Charges: UPI पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू होने के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे अमेरिकी दबाव से जोड़ते हुए सरकार पर निशाना साधा है, लेकिन इस विवाद के बीच मार्च 2026 की संसदीय वित्त समिति की रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण हो गई है। समिति ने लंबे समय तक शून्य MDR व्यवस्था को UPI के लिए वित्तीय रूप से टिकाऊ नहीं माना था और भविष्य के लिए स्थायी राजस्व मॉडल की जरूरत बताई थी।

UPI Charges 2026: UPI MDR विवाद में संसद की रिपोर्ट क्यों बन गई बड़ा मुद्दा?

नई MDR व्यवस्था ने UPI को लेकर पुरानी बहस को फिर सामने ला दिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकार के कदम को ‘UPI टैक्स’ बताते हुए आरोप लगाया कि यह फैसला अमेरिकी दबाव में लिया गया है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि शुल्क व्यापारियों से लिया जाएगा तो उसका असर अंततः ग्राहकों पर कीमतों के जरिए पड़ सकता है। ये राहुल गांधी और कांग्रेस के राजनीतिक दावे हैं।

लेकिन दूसरी तरफ सरकारी और संसदीय रिकॉर्ड में UPI की वित्तीय स्थिरता का सवाल पहले से मौजूद था। मार्च 2026 में संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जीरो-MDR व्यवस्था के कारण UPI इकोसिस्टम को लंबे समय तक आर्थिक रूप से टिकाए रखना चुनौतीपूर्ण है। समिति ने एक व्यवहार्य और स्थायी राजस्व व्यवस्था की जरूरत पर जोर दिया था।

UPI MDR Charges: नई MDR व्यवस्था और इसके नियम

यही वह बिंदु है जिसने मौजूदा राजनीतिक बहस को नया संदर्भ दिया है। यानी MDR पर चर्चा उस समय भी संसद के स्तर पर हो रही थी, जब मौजूदा शुल्क ढांचा लागू नहीं हुआ था। बाद में सरकार ने कानून में बदलाव के जरिए कुछ इलेक्ट्रॉनिक भुगतान पर MDR की गुंजाइश बनाई और सितंबर में नई व्यापारी मूल्य निर्धारण व्यवस्था सामने आई।

नई व्यवस्था के तहत 15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से अधिक के पात्र P2M यानी व्यक्ति-से-व्यापारी UPI लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होगा। 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर यह शुल्क अधिकतम 300 रुपये तक सीमित रहेगा। व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान पर शुल्क नहीं लगाया गया है।

सरकार का पक्ष और आर्थिक चुनौतियाँ

सरकार का कहना है कि MDR कोई सरकारी टैक्स नहीं है। वित्त मंत्रालय के अनुसार करीब 96 प्रतिशत P2M लेनदेन प्रभावित नहीं होंगे, जबकि छोटे व्यापारियों और सामान्य ग्राहकों को सुरक्षा देने के लिए कई श्रेणियों को व्यवस्था से बाहर रखा गया है।

इस बहस का आर्थिक पक्ष भी अहम है। अगस्त 2026 में UPI पर करीब 24.51 अरब लेनदेन, लगभग 29.9 लाख करोड़ रुपये के मूल्य के साथ हुए। इतनी विशाल प्रणाली में सर्वर, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकथाम और बैंकिंग तकनीकी ढांचे पर लगातार खर्च बढ़ रहा है। वित्तीय सेवा विभाग ने संसदीय समिति को बताया था कि P2M भुगतान से जुड़ी लागत करीब 20,700 करोड़ रुपये सालाना तक पहुंच सकती है।

इसलिए मौजूदा विवाद में दो अलग सवाल साथ-साथ खड़े हैं क्या MDR जरूरी है और क्या इसे अमेरिकी दबाव का परिणाम माना जाना चाहिए। पहला सवाल आर्थिक और नीतिगत बहस का विषय है, जबकि दूसरे दावे पर सरकार ने किसी विदेशी दबाव की बात से इनकार किया है।