Supreme Court: नाबालिग को वयस्क कैदियों के बीच रखने पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी 'यह अधिकारों का हनन है'। आगरा जेल की इस बड़ी चूक के लिए अब उत्तर प्रदेश सरकार पीड़ित शख्स को 5 लाख रुपये का हर्जाना भरेगी।
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट के कड़े निर्देश के बाद उत्तर प्रदेश सरकार उस व्यक्ति को 5 लाख रुपये का हर्जाना देगी, जिसे नाबालिग होने के बावजूद वयस्कों के साथ सामान्य जेल में रखा गया था। शीर्ष अदालत ने इस मामले पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए इसे संवैधानिक अधिकारों और बाल सुरक्षा कानूनों का सीधा उल्लंघन करार दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी किशोर को वयस्क अपराधियों के साथ रखना न केवल गैरकानूनी है, बल्कि यह पूरी व्यवस्था की विफलता का प्रमाण है। सर्वोच्च अदालत ने पूरे राज्य में ऐसी गलतियों को दोबारा होने से रोकने के लिए एक एसओपी को मंजूरी दी।
भविष्य में ऐसी गंभीर त्रुटियों को रोकने के लिए जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस एएस चांदुरकर की बेंच ने शनिवार को जारी एक आदेश में कहा कि किसी नाबालिग को वयस्क कैदियों के साथ रखना गैरकानूनी है। अदालत ने आदेश दिया है कि इस SOP को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू किया जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि किसी भी नाबालिग के साथ दोबारा ऐसा अन्याय न हो।
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इस तरह की गलती होने का कारण है अधिकारियों की एक दूसरे से बातचीत नही होना है। यह असंवेदनशीलता और अमानवीय रवैये को दिखाता है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस तरह के गलत कृत्य के लिए राज्य के उस वादे पर गौर किया जिसमें उसने 5 लाख रुपये का मुआवजा पीड़ित को दिए जाने की बात कही थी। सर्वोच्च अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि उस व्यक्ति के वयस्क होने पर उसके बैंक खाते की जानकारी मिलते ही दे दी जाए।
आरोपी घटना के समय नाबालिग था। उसको आगरा सेंट्रल जेल में वयस्क कैदियों के साथ बंद रखा गया था। एक नाबालिग को वयस्क कैदियों के साथ सामान्य जेल में रखा जाना 'किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015' का उल्लंघन था। यह कानून अनिवार्य करता है कि नाबालिगों को केवल ऑब्जर्वेशन होम या विशेष होम में ही रखा जाना चाहिए। उन्हें कभी भी सामान्य जेलों में नहीं रखा जाना चाहिए।
वर्ष 2022 के दोहरे हत्याकांड के एक मामले में आरोपी पर वयस्क की तरह मुकदमा चलाया जा रहा है, जिसकी अनुमति कानून के विशेष प्रावधानों के तहत दी गई है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ किया कि इस प्रक्रिया का मतलब यह कतई नहीं है कि आरोपी के 'नाबालिग' होने के नाते मिलने वाले कानूनी अधिकार खत्म हो जाते हैं। अदालत ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि जब सत्र न्यायालय और इलाहाबाद हाईकोर्ट में जमानत याचिकाओं पर सुनवाई हो रही थी, तब दोनों ही अदालतें इस जरूरी तथ्य पर ध्यान नहीं दिया कि एक नाबालिग को सामान्य जेल में बंद रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि अगर किसी आरोपी को नाबालिग घोषित कर दिया गया है, तो उसे तुरंत सामान्य जेल से हटाकर बाल ऑब्जर्वेशन होम भेजना जरूरी है। इसमें किसी भी तरह की देरी करने का मतलब है कानूनी नियमों का उल्लंघन करना और उस बच्चे के जीवन के मौलिक अधिकार का भी हनन है। अदालत ने प्रशासन और संबंधित अधिकारियों को एक ऐसी ठोस व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया है जिससे आने वाले समय में कभी भी इस तरह की गलतियां न दोहराई जाएं। साथ ही, ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीशों को भी नसीहत दी गई है कि वे किशोरों से जुड़े मामलों में ज्यादा सावधानी बरतें।