
MP Asiatic Lion Rewilding: मध्य प्रदेश में एशियाई शेरों को बसाने की कोशिश एक बार फिर नए चरण में पहुंचती दिखाई दे रही है। भोपाल से सामने आई रिपोर्ट के मुताबिक वन विभाग गुजरात से शुद्ध नस्ल के एशियाई शेरों का जोड़ा लाकर प्रदेश के अलग-अलग वन क्षेत्रों में क्रमबद्ध तरीके से बसाने की तैयारी कर रहा है। नवंबर-दिसंबर में इसकी रूपरेखा पर काम आगे बढ़ने की बात कही गई है। यह कदम केवल मध्य प्रदेश में एक नई वन्यजीव प्रजाति जोड़ने की योजना नहीं है, बल्कि भारत में एशियाई शेरों की दूसरी स्वतंत्र जंगली आबादी तैयार करने की उस रणनीति को फिर सामने लाता है, जिसकी जरूरत वैज्ञानिकों और सरकारों ने वर्षों से बताई है।
गुजरात के गिर और उससे जुड़े लैंडस्केप में 2025 की गणना में एशियाई शेरों की संख्या 891 दर्ज हुई। 2020 में यह संख्या 674 थी। यानी पांच साल में आबादी करीब 32 फीसदी बढ़ी। केंद्र सरकार ने संसद में बताया है कि शेर अब पारंपरिक जंगलों के अलावा नोटिफाइड वन क्षेत्रों, नदी कॉरिडोर और राजस्व भूमि तक फैल चुके हैं। उनके फैलाव और आवागमन को समझने के लिए सैटेलाइट टेलीमेट्री का इस्तेमाल भी किया जा रहा है।
पहली नजर में यह संरक्षण की बड़ी सफलता है। लेकिन यहीं एक बड़ा वैज्ञानिक सवाल भी छिपा है, क्या किसी प्रजाति की संख्या बढ़ जाना ही उसके भविष्य की सुरक्षा की गारंटी है? एशियाई शेरों की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि जंगली आबादी का मूल आधार आज भी गुजरात का गिर लैंडस्केप है। यानी किसी बड़े रोग, महामारी, प्राकृतिक आपदा या किसी दूसरे बड़े पारिस्थितिक संकट का असर एक ही भौगोलिक आबादी पर पड़ सकता है।
एशियाई शेरों के लिए मध्य प्रदेश में दूसरा घर बनाने की बहस नई नहीं है। 15 अप्रैल 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने कूनो में एशियाई शेरों की दूसरी आबादी बसाने को दीर्घकालीन संरक्षण के लिए जरूरी माना था और संबंधित प्रक्रिया छह महीने के भीतर आगे बढ़ाने का निर्देश दिया था। अदालत के सामने वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया के शोध सहित यह तर्क था कि एक ही प्राकृतिक आबादी पर निर्भरता प्रजाति के लिए जोखिम बढ़ाती है। यानी आज मध्य प्रदेश में जिस री-वाइल्डिंग की बात हो रही है, उसकी जड़ किसी नई राजनीतिक या प्रशासनिक योजना में नहीं, बल्कि एक दशक से ज्यादा पुराने संरक्षण मॉडल में है।
2026 में गिर क्षेत्र में शेरों की मौत और बीमारी को लेकर चिंता ने इस पुराने सवाल को और गंभीर बना दिया। जून 2026 में कुछ रिपोर्टों में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस यानी CDV और बेबेसियोसिस को लेकर आशंका सामने आई, जबकि गुजरात सरकार ने बाद में कुछ मौतों में इन दोनों कारणों को जांच में खारिज किए जाने की जानकारी दी।
इसका मतलब यह नहीं कि गुजरात की पूरी शेर आबादी तत्काल संकट में है। असली मुद्दा एक ही जंगली आबादी पर निर्भरता का जोखिम है। 2018 में गिर क्षेत्र में CDV से जुड़े प्रकोप में कई शेरों की मौत दर्ज हुई थी। वैज्ञानिक साहित्य भी एशियाई शेरों की जंगली आबादी को लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में सीमित रहने वाली आबादी के रूप में दर्ज करता रहा है।
मध्य प्रदेश की प्रस्तावित योजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसका मूल्यांकन सिर्फ इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने शेर लाए गए। असल सफलता तब होगी जब, गुजरात के बाहर एक ऐसी स्वतंत्र आबादी तैयार हो सके जो कई पीढ़ियों तक अपने दम पर प्रजनन करे, पर्याप्त शिकार-आधार पर टिके, स्थानीय पारिस्थितिकी के साथ संतुलन बनाए और बीमारी या प्राकृतिक आपदा की स्थिति में पूरी प्रजाति के लिए सुरक्षा-कवच का काम करे।
यही वजह है कि 'री-वाइल्डिंग' शब्द यहां महज जंगल में शेर छोड़ने से कहीं बड़ा है। इसमें आनुवंशिक चयन, स्वास्थ्य जांच, रोग निगरानी, शिकार-आधार, क्षेत्रीय क्षमता, मानव-वन्यजीव संघर्ष और कई पीढ़ियों की निगरानी शामिल होगी।
कूनो को कभी एशियाई शेरों के दूसरे घर के रूप में तैयार किया गया था। बाद में यही परिदृश्य अफ्रीकी चीतों के पुनर्वास के लिए इस्तेमाल हुआ। केंद्र के Project Cheetah दस्तावेजों में भी दर्ज है कि कूनो में एशियाई शेरों के पुनर्प्रवेश के लिए पहले से संरक्षण निवेश किया जा चुका था।
इसलिए अब मध्य प्रदेश के सामने सवाल सिर्फ 'शेर कहां छोड़े जाएं?' का नहीं है। बल्कि सवाल यह है कि भारत अपने एकमात्र जंगली एशियाई शेर वंश को भविष्य में एक से अधिक स्वतंत्र आबादियों में कैसे सुरक्षित रखे।
गुजरात ने शेरों को बचाकर दुनिया के सामने सफल संरक्षण का उदाहरण रखा है। अब अगला चरण उस सफलता को एक भौगोलिक क्षेत्र से निकालकर राष्ट्रीय संरक्षण रणनीति में बदलने का है। अगर MP की नई तैयारी वैज्ञानिक कसौटियों, आनुवंशिक शुद्धता और रोग-सुरक्षा के साथ आगे बढ़ती है, तो यह सिर्फ मध्य प्रदेश में शेरों की वापसी नहीं होगी। यह भारत के वन्यजीव संरक्षण में 'एक आबादी से दो सुरक्षित आबादी' की दिशा में ऐतिहासिक बदलाव हो सकता है।