देश की राजधानी दिल्ली को खुले में शौचमुक्त करने के दावों की तब कलई खुल गई, जब लोग खुले में शौच करते दिखे
- रिजवान अंसारी, टिप्पणीकार
शौचालय निर्माण योजनाओं में भ्रष्टाचार की खबरों से सरकार को हरकत में आ जाना चाहिए था, लेकिन जिम्मेदार खामोश हैं। अनियमितताओं पर रोक लगाने के बजाय, गलत आंकड़े पेश करना सरकार की नीयत पर संदेह पैदा करता है।
स्वच्छ भारत अभियान का जोर-शोर से प्रचार किया जा रहा है। लेकिन दूसरी तरफ सरकारी महकमा जमीनी स्तर पर काम करने के बजाय झूठे आंकड़े पेश करने में मशगूल है। देश की राजधानी दिल्ली को खुले में शौचमुक्त करने के दावों की तब कलई खुल गई, जब लोग खुले में शौच करते दिखे। इतना ही नहीं जो दिल्ली हमेशा केन्द्र सरकार की नजरों के सामने रहती है, उसी दिल्ली में सडक़ों पर कचरे के ढेर अभियान की हकीकत उजागर कर रहे हैं। ऐसे में देश के दूसरे हिस्सों में इस अभियान की क्या स्थिति होगी, अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे में ये तीन घटनाएं अभियान के प्रति सरकारी अमले की संजीदगी को उजागर करती है।
पहली, बिलासपुर में कुछ लोगों को सरकारी ट्रक पर लाद कर सिर्फ इसलिए घुमाया गया क्योंकि उन्होंने खुले में शौच करने की हिमाकत की थी। दूसरी, उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में एक सरकारी फरमान जारी किया गया कि खुले में शौच करने वाले साथ में खुरपी भी लेकर जाएं और शौच के बाद मल पर मिट्टी डालें। अन्यथा, उन पर जुर्माना लगाया जाएगा। तीसरी घटना झारखंड के रांची की है, जहां पुलिस वालों ने कुछ लोगों की लूंगी इसलिए उतार दी क्योंकि उन्होंने खुले में शौच करने की भूल की थी। ये तीनों ही घटनाएं लोकतंत्र के लिए बेहद शर्मनाक हैं।
सवाल है कि योजनाओं को लागू कराने की खातिर ऐसा अमानवीय व्यवहार कितना उचित है? क्या बंदूक की नोक पर लोगों को योजनाओं पर अमल करने के लिए बाध्य किया जाएगा? सरकार को यह मंथन करने की जरूरत है कि क्या देश को स्वच्छ बनाने के लिए पर्याप्त खाका तैयार किया जा चुका है? शौचालय मुहैया कराने की बजाय पुलिसिया कार्रवाई करने का क्या औचित्य है? शौचालय निर्माण योजनाओं में भ्रष्टाचार की खबरों से सरकार को हरकत में आ जाना चाहिए था, लेकिन अब तक जिम्मेदार खामोश हैं।
अनियमितताओं पर रोक लगाने के बजाय, गलत आंकड़े पेश करना सरकार की नीयत पर संदेह पैदा करता है। संदेह इसलिए भी कि केन्द्र सरकार की नाक के नीचे दिल्ली में ही सैप्टिक टैंकों में इस वर्ष अब तक 80 से ज्यादा सफाईकर्मियों की दम घुटने से मौत हो चुकी है क्योंकि उन्हें बिना सुरक्षा उपकरणों के ही टैंकों में उतरना पड़ा था। वर्ष 2008 में मद्रास उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया था कि सीवरों की सफाई हाथ से नहीं होगी। लेकिन, कोर्ट के आदेश को ताक पर रख दिया गया है। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वो योजनाओं का क्रियान्वयन कितनी गंभीरता से कर पाती है।