दिवाली ही नहीं, किसी भी भारतीय त्योहार को सिनेमा में आज कोई जगह नहीं मिल रही। मुझे याद है दशहरे-दिवाली के समय पहले सिनेमा घरों में पुरानी फिल्में चला करती थीं, क्योंकि आमतौर पर लोग त्योहारों में स्वयं व्यस्त रहते थे। त्योहारों का मतलब सिनेमा देखना नहीं, साफ-सफाई, पूजापाठ, लोगों से मिलना-जुलना, अतिथियों का स्वागत ज्यादा था। अब जब खास तौर पर कोई फिल्म दिवाली के दिन का ही इन्तजार करती है तो हमारे लिए खुश होने से ज्यादा सोचने का वक्त है कि क्या वाकई हमारा अकेलापन इतना बढ़ गया है कि दिवाली भी सिनेमा घरों में मनाएंगे।
विनोद अनुपम
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक
दीपावली के दौरान एक बार फिर दो बड़ी फिल्में हमारे सामने होंगी, रोहित शेट्टी की सितारों से लदी 'सिंघम अगेन' और लगातार सफलता दुहराती 'भूलभुलैया 3'। हमारे लिए एक बार फिर तय करना मुश्किल होगा कि हम अपने घरों में दिए जलाएं, अपने मित्रों रिश्तेदारों से मुलाकात करें या फिर किसी मल्टीप्लेक्स में तीन घंटे गुजार दें। समय ने त्योहारों के मायने बदल दिए हैं।
आज दिवाली का सीधा सा अर्थ बाजार हो गया है। महत्त्वपूर्ण यह नहीं कि आप कितने दिए रोशन कर रहे हैं, महत्त्वपूर्ण यह है कि दिवाली पर कितने की खरीदारी कर रहे हैं। जाहिर है खरीदारी के इस महापर्व के अवसर का लाभ उठाने में सिनेमा क्यों चूकता। पहले दिवाली के दृश्यों वाली फिल्म दिवाली के अवसर पर रिलीज होती थी तो उसका एक मतलब समझ में आता था। 50 के दशक में 'आई दिवाली' और 'दिवाली की रात' जैसी फिल्मों की तो बात ही अलग है। बाद के दिनों में भी 'अनुराग' और 'जंजीर' जैसी फिल्मों में भी दिवाली दिखती थी तो उसका औचित्य भी दिखता था। अपने त्योहार में अपने नायकों या कहें पात्रों को शामिल देख दर्शकों को अच्छा भी लगता था।
हिन्दी सिनेमा की इस सीधी सी समझ को बदल डाला 'दिलवाले दुल्हनियां ले जाएंगे' की ऐतिहासिक सफलता ने। दिवाली के अवसर पर इसका रिलीज होना भले ही संयोग रहा हो, लेकिन जैसे-जैसे यह फिल्म सफलता के नए मानदण्ड रचते गई, फिल्मकारों के मन में यह बात मजबूत होती गई कि दिवाली फिल्मों की सफलता की राह सुगम बनाती है। इस विश्वास को बाद के वर्षों में दिवाली के अवसर पर रिलीज होने वाली 'हम आपके हैं कौन', 'राजा हिन्दुस्तानी', 'कुछ कुछ होता है', 'दिल तो पागल है', 'हम साथ-साथ हैं', 'मोहब्बतें', 'वीर जारा', 'राम रतन धन पायो' जैसी फिल्मों की सफलता ने और भी मजबूती दी। इतनी मजबूती कि वे दिवाली के ही अवसर पर रिलीज होने वाली 'रामसेतु','ठग्स आफ हिंदुस्तान','शिवाय' जैसी बड़े बजट की फिल्मों की विफलता भी भूल जाते हैं। दिवाली बड़ा त्योहार है। ऐसा त्योहार जिसे लोग धन की देवी से भी जोड़कर देखते हैं। लेकिन, इसे फिल्मों की सफलता को जोड़कर देखा जाना हिन्दी फिल्मकारों के अंधविश्वास के सिवा और कुछ नहीं।
वास्तव में सिनेमा के लिए महत्त्व दिवाली का नहीं, इस अवसर पर मिली छुट्टी का होता है। दिवाली से यदि सिनेमा ने सरोकार रखा होता तो दिवाली के दृश्य आज सिनेमा में भूले बिसरे गीत नहीं बन गए होते। दिवाली ही नहीं, किसी भी भारतीय त्योहार को सिनेमा में आज कोई जगह नहीं मिल रही। मुझे याद है दशहरे-दिवाली के समय पहले सिनेमा घरों में पुरानी फिल्में चला करती थीं, क्योंकि आमतौर पर लोग त्योहारों में स्वयं व्यस्त रहते थे। त्योहारों का मतलब सिनेमा देखना नहीं, साफ-सफाई, पूजापाठ, लोगों से मिलना-जुलना, अतिथियों का स्वागत ज्यादा था। अब जब खास तौर पर कोई फिल्म दिवाली के दिन का ही इन्तजार करती है तो हमारे लिए खुश होने से ज्यादा सोचने का वक्त है कि क्या वाकई हमारा अकेलापन इतना बढ़ गया है कि दिवाली भी सिनेमा घरों में मनाएंगे।