
-विजय चौधरी
किले किसी जमाने में राज पाट, प्रजा और खजाने की हिफाजत के लिए बनाए जाते थे। राजस्थान तो किलों और रियासतों की धरती रहा है। कहीं किले के भीतर राजमहल सुरक्षित था, कहीं पूरा शहर ही चारदीवारी में बसा था। बाहर से आने वाले खतरे को रोकना ही उनकी सबसे बड़ी जरूरत थी। समय बदला, राजशाही गई, लोकतंत्र आया। लेकिन किले का विचार अभी बाकी है।
फर्क इतना है कि अब खतरा बाहर से नहीं, सत्ता के भीतर के गणित से दिखाई देने लगा है। नगरीय निकाय चुनाव में पार्षद प्रत्याशियों की जिस तरह किलाबंदी हो रही है, वह लोकतंत्र की एक ऐसी तस्वीर सामने रखती है, जिस पर हंसा भी जा सकता है और गंभीरता से सोचा भी जा सकता है। कभी राजा अपने किले में सुरक्षित रहता था, अब राजनीतिक दल अपने संभावित प्रतिनिधियों को किले में सुरक्षित रख रहे हैं। होटल, रिसॉर्ट, बसें और निगरानी…चुनाव का यह नया किलाबंदी तंत्र खुलेआम सक्रिय है।
अभी नतीजे आए नहीं हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने उससे पहले ही अपने संभावित प्रतिनिधियों की आवाजाही शुरू कर दी है। पार्षद प्रत्याशी ही नहीं, कई जगह उनके परिवार भी बसों में बैठाकर सुरक्षित ठिकानों तक पहुंचाए जा रहे हैं। न कोई छिपाव, न कोई संकोच। जैसे यह भी चुनावी प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा हो और इस पूरी कवायद में प्रदेश के बड़े राजनीतिक चेहरे भी जुटे हुए हैं, जिन नेताओं से प्रदेश के बड़े सवालों पर नेतृत्व की उम्मीद होती है, वे फिलहाल पार्षदों की संख्या संभालने, अपने खेमे को सुरक्षित रखने और चुनाव बाद के गणित को साधने में व्यस्त हैं। यहीं से लोकतंत्र का मखौल शुरू होता है।
सवाल सीधा है, आखिर किलेबंदी की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्योंकि जनता पार्षद चुनती है, लेकिन मेयर या बोर्ड अध्यक्ष का चुनाव सीधे जनता नहीं करती। नतीजे आने के बाद पार्षदों की संख्या सत्ता का गणित तय करती है। एक एक वोट की कीमत बढ़ती है। बहुमत का हिसाब लगता है। निर्दलीय अचानक निर्णायक हो जाते हैं और फिर शुरू होती है अपने ही पार्षदों को संभालकर रखने की कवायद। सीधे चुनाव हों तो काहे की किलेबंदी? जिसे जनता मेयर बनाना चाहती है, उसे सीधे चुनने का अधिकार जनता को दे दीजिए। फिर न रिसॉर्ट की जरूरत होगी, न बसों की कतार की, न यह हिसाब रखने की कि कौन किसके संपर्क में है और कौन किस खेमे में जा सकता है।
इस पूरे खेल में निर्दलीय सबसे दिलचस्प किरदार हैं। चुनाव से पहले जिनकी राजनीतिक हैसियत सीमित दिखाई देती है, नतीजे के बाद वही सत्ता की चाबी बन जाते हैं। एक-एक निर्दलीय के लिए खेमेबंदी होने लगती है। तो फिर एक प्रयोग क्यों न कर लिया जाए? निर्दलीय इतने ही निर्णायक हैं तो सत्ता उन्हीं के पास रहने दीजिए। भाजपा और कांग्रेस दोनों विपक्ष में में बैठकर लोकतंत्र की रखवाली करें!
व्यंग्य अपनी जगह, लेकिन किलाबंदी का असली अर्थ कहीं ज्यादा गंभीर है। यह विरोधी से ज्यादा अपने ही चुने हुए प्रतिनिधि पर अविश्वास की कहानी है। पार्टी ने टिकट दिया, चुनाव चिह्न दिया, अपना उम्मीदवार बताया और जनता के सामने उतारा। चुनाव होते ही उसी प्रतिनिधि को अपने घेरे में रखना पड़ा। जिसे अपना कहकर मैदान में उतारा, उसी के लिए किला बनाना पड़े-इससे बड़ा अविश्वास क्या होगा?
और अगर खुले में रहने वाला पार्षद इतना असुरक्षित है, तो सवाल कानून-व्यवस्था पर भी उठता है। क्या उस पर राजनीतिक दबाव बनाया जा सकता है? लालच या धमकी दी जा सकती है? परिवार को प्रभावित किया जा सकता है? क्या अपहरण जैसी आशंकाएं भी इस किलेबंदी के पीछे हैं? इन सवालों को सनसनी की तरह नहीं, गंभीर चिंता की तरह देखना चाहिए। लोकतंत्र में निर्वाचित प्रतिनिधि को सुरक्षा इसलिए मिलनी चाहिए कि वह निर्भय होकर अपना मत दे सके, न कि इसलिए कि उसे स्वतंत्र होकर अपना मत देने से ही रोका जाए।
फिर इस किलेबंदी की कीमत भी है। बसें, होटल, रिसॉर्ट, भोजन और दूसरी व्यवस्थाएं…इनका खर्च कौन उठा रहा है? पैसा कहां से आ रहा है? और अगर यह राजनीतिक निवेश है तो चुनाव के बाद इसका रिटर्न क्या होगा? जनता ने वोट देकर प्रतिनिधि चुनने का अधिकार दिया है। उसने किसी को राजनीतिक किले में रखने का ठेका नहीं दिया। 14 सितंबर को नतीजे आएंगे तो इस किलेबंदी का एक और पहलू सामने आएगा।
कल तक सब अपने थे। नतीजे के बाद कुछ अंदर रहेंगे, कुछ को किकआउट कर दिया जाएगा। किले कभी सुरक्षा की निशानी थे। लोकतंत्र की सुरक्षा किलों से नहीं, भरोसे से होती है। इस समय सवाल किले की ऊंचाई का नहीं है, सवाल यह है कि भरोसा इतना नीचे कैसे गिर गया?